{"product_id":"ram-kattha-9788180319723","title":"Ram Kattha","description":"\u003cp\u003e • Author(s): Hiralal Shukla | Tr. Rajendra Kumar Dube\u003cbr\u003e • Publisher: Lokbharti Prakashan\u003cbr\u003e • Publisher Imprint: Lokbharti Prakashan\u003cbr\u003e\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003c\/p\u003e\u003cp\u003eआदिवासियों की कुडुख बोली की यह 'राम कत्था' उनके अपने जीवन, समाज, संस्कृति और\u003cbr\u003eवर्तमान तथा भविष्य की कथा है। यह उनकी अपनी सृष्टि को रचने और उसमें बसने की भी कथा है।\u003cbr\u003eइस पुस्तक की रामकथा वही रामकथा है जो गोस्वामी तुलसीदास के 'रामचरितमानस' की रही है। बस अन्तर\u003cbr\u003eयह कि गोस्वामी जी ने तो रामकथा एक ही बार लिखी, पर इस जगत् के लोगों ने उसे अपने युग में अपनी-\u003cbr\u003eअपनी भाषा-बोली में बार-बार लिखा, और अब भी लिख रहे हैं। यह एक कृति की जन से जुड़ने की बड़ी\u003cbr\u003eसफलता होती है, जिसे गोस्वामी तुलसीदास ने कर दिखाया था।\u003cbr\u003eज़ाहिर-सी बात है कि इस कथा में सबकी कथा थी और इस कथा की व्यथा में सबकी व्यथा, तभी तो यह कथा\u003cbr\u003eगाथा बनी और बनती रही है। हमें इस रूप में भी इस पुस्तक को देखना चाहिए कि इसी कथा में राम के साथ\u003cbr\u003eयुद्ध में शामिल वे ही लोग थे, जो वानर, भालू, गिद्ध आदि जनजातियों के रूप में हाशिए की दुनिया के थे,\u003cbr\u003eऔर जिनके बल पर जीत हासिल करते हैं राम। यह पुस्तक एक पुस्तक ही नहीं, जनजातियों की तरफ़ से एक\u003cbr\u003eहस्तक्षेप भी है।\u003c\/p\u003e","brand":"Lokbharti Prakashan","offers":[{"title":"Hardcover","offer_id":45285581684887,"sku":"9788180319723","price":175.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0666\/3471\/1191\/files\/9788180319723.webp?v=1769283799","url":"https:\/\/atlanticbooks.com\/products\/ram-kattha-9788180319723","provider":"Atlantic Books","version":"1.0","type":"link"}