{"product_id":"rashtra-bhasha-aur-rashtriya-ekta-dinkar-granthmala-9789389243796","title":"Rashtra-Bhasha Aur Rashtriya Ekta : Dinkar Granthmala","description":"\u003cp\u003e • Author(s): Ramdhari Singh 'Dinkar'\u003cbr\u003e • Publisher: Lokbharti Prakashan\u003cbr\u003e • Publisher Imprint: Lokbharti Prakashan\u003cbr\u003e\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003cstrong\u003e–\u003c\/strong\u003e ‘जातियों का सांस्कृतिक विनाश तब होता है जब वे अपनी परम्पराओं को भूलकर दूसरों की परम्पराओं का अनुकरण करने लगती हैं। इस सांस्कृतिक दासता का भयानक रूप वह होता है, जब कोई जाति अपनी भाषा को छोड़कर दूसरों की भाषा अपना लेती है। फल यह होता है कि वह जाति अपना व्यक्तित्व खो बैठती है। उसके स्वाभिमान का विनाश हो जाता है!' स्वाधीनता के सात वर्ष बाद राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ द्वारा दी गई यह गम्भीर चेतावनी आज भी उतनी ही प्रासंगिक है, जितनी उस समय थी।\u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003eदिनकर जी एक समर्थ कवि और ओजस्वी वक्ता ही नहीं, प्रखर चिन्तक भी थे। इस संग्रह में जो विचारोत्तेजक, सारगर्भित भाषण और लेख संगृहीत हैं, वे इस बात के प्रत्यक्ष उदाहरण हैं।\u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003e'राष्ट्रभाषा और राष्ट्रीय एकता' पुस्तक जिसका विषय प्राय: भाषा और संस्कृति है, देश की ज्वलन्त समस्याओं के प्रति दिनकर जैसे एक साहित्यकार का निर्भीक दृष्टिकोण भी है।\u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003eसंस्कृति की रचना और अभिव्यक्ति कला के माध्यम से होती है और भारतीय कला का यह स्वाभाव है कि वह यूरोप की कलात्मक भंगिमाओं से सामंजस्य नहीं बिठा सकती। प्राचीन काल में, यूनानी कला का सम्मिश्रण भारतीय कला से हुआ था। परिणामस्वरूप, गांधार-कला का जन्म हुआ किन्तु वह भारत में टिक नहीं सकी, क्योंकि वह अभारतीय थी, क्योंकि भारत की आत्मा अपने को इस मिश्रित कला के भीतर से व्यक्त नहीं कर सकती थी ।\u003c\/p\u003e","brand":"Lokbharti Prakashan","offers":[{"title":"Paperback","offer_id":45285628444823,"sku":"9789389243796","price":139.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0666\/3471\/1191\/files\/9789389243796.webp?v=1769283919","url":"https:\/\/atlanticbooks.com\/products\/rashtra-bhasha-aur-rashtriya-ekta-dinkar-granthmala-9789389243796","provider":"Atlantic Books","version":"1.0","type":"link"}