{"product_id":"raushni-ke-phool-9788119014675","title":"Raushni Ke Phool","description":"\u003cp\u003e • Author(s): Nida Fazli Compiled\u003cbr\u003e • Publisher: Vani Prakashan\u003cbr\u003e • Publisher Imprint: Vani Prakashan\u003cbr\u003e • BISAC: Memoirs\u003c\/p\u003e\u003cp\u003eकमलेश्वर कोई सूफ़ी सन्त तो नहीं थे, लेकिन इलाहाबाद से बम्बई की लम्बी यात्रा के चढ़ाव ने उन्हें चेहरों से दिलों को पढ़ने की दृष्टि ज़रूर दी थी। उन्हें अपनी भूख के साथ मेरी और सुरेन्द्र प्रकाश की खाली पेटों की भी ख़बर थी। दुख में नीर बहा देते थे सुख में हँसने लगते थे सीधे-सादे लोग थे लेकिन कितने अच्छे लगते थे। यह उन दिनों का ग्वालियर था, जब मैंने इसे छोड़ा था। अब वहाँ भी रास्तों में भीड़ की रेलपेल ने नयी-नयी कालोनियों में बने फ्लटों से दालान और आँगन छीन लिए हैं। फ़िराक़ साहब सिर्फ़ शाइर नहीं थे, अपने के बड़े आलोचक भी, क्लासिकी शाहरों पर उनके लेख, साहित्य को नये सिरे से पढ़ने और समझने की कामवाद कोशिशें मानी जाती हैं। उनके जहन को कई भाषाओं की रोशनियों ने रोशन किया था। इनमें हिन्दी, उर्दू, फ़ारसी, संस्कृत के साथ अंग्रेज़ी का भी नाम है। वह महात्मा गांधी, पण्डित नेहरू, अबुल कलाम आजाद, मौलाना हसरत मोहानी, महाकवि निराला, डॉ. राधाकृष्णन आदि के युग की एक बड़ी शख्सियत थे। कुदरत की इस मेहरवानी का उन्हें अहसास भी था। (संकलित लेखों से)\u003c\/p\u003e","brand":"Vani Prakashan","offers":[{"title":"Paperback","offer_id":46523107049623,"sku":"9788119014675","price":202.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0666\/3471\/1191\/files\/9788119014675.webp?v=1767180047","url":"https:\/\/atlanticbooks.com\/products\/raushni-ke-phool-9788119014675","provider":"Atlantic Books","version":"1.0","type":"link"}