{"product_id":"saankal-9788126726226","title":"Saankal","description":"\u003cp\u003e • Author(s): Zakia Zubairi\u003cbr\u003e • Publisher: Rajkamal Prakashan\u003cbr\u003e • Publisher Imprint: Rajkamal Prakashan\u003cbr\u003e • BISAC: General\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003c\/p\u003e\u003cp\u003eयह बात सच है कि पैदाइश और परवरिश का माहौल ज़िन्दगी भर ज़ेहन पर हावी रहता है। और अगर तालीम का रंग भी इनमें शामिल हो जाए तो सोच का मुकम्मल ख़ाक़ा तैयार हो जाता है। ज़किया ज़ुबैरी की कहानियों का संग्रह ‘साँकल’ पढ़ते हुए बारहा यही महसूस होता है। इन कहानियों पर राजेन्द्र यादव की यह राय दुरुस्त है कि, ‘उनकी कहानियाँ ऐसे नारी मन के विभिन्न पहलुओं पर केन्द्रित हैं जो अभी भी भारत को अपने भीतर बसाए हुए है। वे द्वन्द्व और नॉस्टेल्जिया की कहानियाँ हैं।’\u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003eज़किया औरतों की ज़िन्दगी में आहिस्ता से दाख़िल होकर उनके मन की परतों को खोलती हैं। भीतरी तहों में दबे सच कभी ‘बाबुल मोरा’ की लिसा, तो कभी ‘मेरे हिस्से की धूप’ की शम्मो के रूप में सामने आते हैं। अगर लेखिका की संवेदना परखनी हो तो ‘मारिया’, ‘साँकल’, ‘लौट आओ तुम’ जैसी कहानियाँ पढ़नी चाहिए।\u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003eसरोकार के साथ भाषा लेखिका की बहुत बड़ी ताक़त है। बड़ी सहजता से पूरा मंज़र सामने खड़ा हो जाता है, ‘किसी से डर न ख़ौफ़—बिन्दास! छोटी-छोटी आँखों को टेढ़ी करके बात किया करती, बात-बात पर खिलखिलाकर हँस देती और हँसते हुए झूल-सी जाती। वो जो कपड़े पहने होती, ऊँचे-नीचे, बेमेल-से, कहीं-कहीं से सिलाई खुले हुए कपड़ों से जवानी झाँक रही होती। वह एक ऐसी बेटी थी जिसके कारण घर में कंकरों की आमद बनी रहती।’ बेहद दिलचस्प कहानियों का संग्रह।\u003c\/p\u003e","brand":"Rajkamal Prakashan","offers":[{"title":"Hardcover","offer_id":45285575983255,"sku":"9788126726226","price":210.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0666\/3471\/1191\/files\/9788126726226.webp?v=1769283786","url":"https:\/\/atlanticbooks.com\/products\/saankal-9788126726226","provider":"Atlantic Books","version":"1.0","type":"link"}