{"product_id":"sahityik-parivesh-ke-vyangya-9788173151552","title":"Sahityik Parivesh Ke Vyangya","description":"\u003cp\u003e • Author(s): Giriraj Sharan Agrawal\u003cbr\u003e • Publisher: Prabhat Prakashan Pvt. Ltd.\u003cbr\u003e • Publisher Imprint: Prabhat Prakashan Pvt. Ltd.\u003cbr\u003e • BISAC: General\u003c\/p\u003e\u003cp\u003eसाहित्यिक परिवेश के व्यंग्यदूसरों का हाल तो हम जानते नहीं, लेकिन जहाँ तक हमारा सवाल है, साहित्यकार बनकर हम बहुत घाटे में रहे; यानी चक्कर में सदा दाल- आटे के रहे । हजारों-लाखों बार सोचा कि काश, हम साहित्यकार न हुए होते, किसी कार्यालय में अहलकार हो गए होते, किसी अधिकारी के पेशकार हो गए होते और यह भी संभव नहीं था तो किसी धनपति राजा- महाराजा के दरबार में चाटुकार ही हो गए होते । चाटुकारिता कुछ भी हो, लेकिन साहित्यकारिता की तुलना में कहीं अधिक लाभदायक होती है ।अपि अपने विरुद्ध बनाए गए किसी मुकदमे के सिलसिले में अदालत जाइए । आप देखेंगे कि वहाँ पेशकार नाम के सज्जन पूर्णरूप से ध्यानमग्न हुए अपनी कुरसी पर विराजमान हैं । वादियों - प्रतिवादियों की भीड़ सामने खड़ी हुई है । हरेक व्यक्‍त‌ि अपनी- अपनी कह रहा है, लेकिन वह किसी की भी नहीं सुनते हैं, अपने काम में व्यस्त हैं । वह जनवादी साहित्य नहीं, बल्कि कानूनवादी साहित्य रचने में जुटे हैं, और नजर उठाकर अपनी तरफ देखने को भी तैयार नहीं । जैसे-तैसे आप उनके निकट तक पहुँचते हैं और दस का नोट उनकी मुट्ठी में दबा देते हैं । तब वह झटपट कानूनवादी साहित्य रचकर फाइल आपकी ओर बढ़ा देते हैं कि दस्तखत करो ।साहित्यिक गतिविधियों और साहित्यकारों की परिस्थितियों पर प्रस्तुत ये सार्थक व्यंग्य आपको गुदगुदाएँगे भई और अंदर तक प्रहार भी करेंगे ।\u003c\/p\u003e","brand":"Prabhat Prakashan Pvt. Ltd.","offers":[{"title":"Hardcover","offer_id":46839464132759,"sku":"9788173151552","price":140.0,"currency_code":"INR","in_stock":false}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0666\/3471\/1191\/files\/9788173151552.webp?v=1769160673","url":"https:\/\/atlanticbooks.com\/products\/sahityik-parivesh-ke-vyangya-9788173151552","provider":"Atlantic Books","version":"1.0","type":"link"}