{"product_id":"salaam-9788171198979","title":"Salaam","description":"\u003cp\u003e • Author(s): Omprakash Valmiki\u003cbr\u003e • Publisher: Radhakrishna Prakashan\u003cbr\u003e • Publisher Imprint: Radhakrishna Prakashan\u003cbr\u003e\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e‘दलित लेखन दलित ही कर सकता है’ को पारम्परिक सोच के ही नहीं, प्रगतिशील कहे जानेवाले आलोचकों ने भी संकीर्णता से लिया है। दलित-विमर्श साहित्य में व्याप्त छद्म को उघाड़ रहा है। साहित्य में जो भी अनुभव आते हैं वे सार्वभौमिक और शाश्वत नहीं होते।\u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003eइन सन्दर्भों में ओमप्रकाश वाल्मीकि की कहानियाँ दलित जीवन की संवेदनशीलता और अनुभवों की कहानियाँ हैं, जो एक ऐसे यथार्थ से साक्षात्कार कराती हैं, जहाँ हज़ारों साल की पीड़ा अँधेरे कोनों में दुबकी पड़ी है।\u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003eवाल्मीकि के इस संग्रह की कहानियाँ दलितों के जीवन-संघर्ष और उनकी बेचैनी के जीवन्त दस्तावेज़ हैं, दलित जीवन की व्यथा, छटपटाहट, सरोकार इन कहानियों में साफ़-साफ़ दिखाई पड़ते हैं।\u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003eओमप्रकाश वाल्मीकि ने जहाँ साहित्य में वर्चस्व की सत्ता को चुनौती दी है, वहीं दबे-कुचले, शोषित-पीड़ित जन-समूह को मुखरता देकर उनके इर्द-गिर्द फैली विसंगतियों पर भी चोट की है। जो दलित विमर्श को सार्थक और गुणात्मक बनाती है।\u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003eसमकालीन हिन्दी कहानी में दलित-चेतना की दस्तक देनेवाले कथाकार ओमप्रकाश वाल्मीकि की ये कहानियाँ अपने आप में विशिष्ट हैं। इन कहानियों में वस्तु जगत का आनन्द नहीं, दारुण दुःख भोगते मनुष्यों की बेचैनी है।\u003c\/p\u003e","brand":"Radhakrishna Prakashan","offers":[{"title":"Paperback","offer_id":45285685657751,"sku":"9788171198979","price":139.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0666\/3471\/1191\/files\/9788171198979.webp?v=1769284064","url":"https:\/\/atlanticbooks.com\/products\/salaam-9788171198979","provider":"Atlantic Books","version":"1.0","type":"link"}