{"product_id":"samajik-vyavastha-par-vyangya-9788173151514","title":"Samajik Vyavastha Par Vyangya","description":"\u003cp\u003e • Author(s): Giriraj Sharan Agrawal\u003cbr\u003e • Publisher: Prabhat Prakashan Pvt. Ltd.\u003cbr\u003e • Publisher Imprint: Prabhat Prakashan Pvt. Ltd.\u003cbr\u003e • BISAC: General\u003c\/p\u003e\u003cp\u003eसामाजिक व्यवस्था पर व्यंग्य हमारे मित्र एक अद‍्भुत सवाल हल करने में व्यस्त थे । हमें देखते ही बोले, ' कितनी ही बार इस प्रश्‍न की चूल से चूल भिड़ा चुका हूँ किंतु उत्तर हर बार अव्यवस्था ही आता है । ' हम आश्‍चर्य में पड़ गए । समझ न पाए कि मामला क्या है । कुछ देर बाद उन्होंने स्वयं ही कागजों के पुलंदे से सिर ऊपर उठाया और बोले, ' व्यवस्थाएँ कई प्रकार की होती हैं । ' हमने ' हाँ ' में उत्तर देते हुए कहा, ' होती तो हैं जी । 'बोले-' जैसे समाज-व्यवस्था, अर्थ- व्यवस्था, न्याय-व्यवस्था, शांति-व्यवस्था, राजनीतिक-व्यवस्था, कानून-व्यवस्था, परिवार-व्यवस्था, नागरिक-व्यवस्था, ग्रामीण-व्यवस्था, राज-व्यवस्था और ताज-व्यवस्था । इन सारी व्यवस्थाओं को जब कभी बीजगणित के सिद्धांत पर जोड़ने का प्रयास करता हूँ तो उत्तर आता है-' घोर अव्यवस्था । 'इतना कहकर श्रीमान अमुक थोड़ा हँसे और बोले-' क्यों भाई, तुम्हारा क्या विचार है? सारी व्यवस्थाओं का जोड़ ' घोर अव्यवस्था ' ठीक है ना?'हमने अपने मित्र को समझाया कि ' श्रीमान अमुकजी, व्यवस्था कोई भी हो, वह जोड़-घटाकर देखने की चीज नहीं होती, आँखें मूँदकर भोगे जाने की चीज होती है । आप अकारण अपना समय बरबाद कर रहे हैं ।'अपनी प्रहारक क्षमता से परिपूर्ण इस पुस्तक के व्यंग्य सामाजिक व्यवस्था की पहचान के विभिन्न दृश्य प्रस्तुत करते हैं ।\u003c\/p\u003e","brand":"Prabhat Prakashan Pvt. Ltd.","offers":[{"title":"Hardcover","offer_id":46839468097687,"sku":"9788173151514","price":140.0,"currency_code":"INR","in_stock":false}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0666\/3471\/1191\/files\/9788173151514.webp?v=1769160674","url":"https:\/\/atlanticbooks.com\/products\/samajik-vyavastha-par-vyangya-9788173151514","provider":"Atlantic Books","version":"1.0","type":"link"}