{"product_id":"sanskriti-varchswa-aur-pratirodh-9789393768131","title":"Sanskriti : Varchswa Aur Pratirodh","description":"\u003cp\u003e • Author(s): Purushottam Agarwal\u003cbr\u003e • Publisher: Rajkamal Prakashan\u003cbr\u003e • Publisher Imprint: RajkamalP\u003cbr\u003e • Subject: Religion and Philosophy\u003cbr\u003e\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e‘संस्कृति : वर्चस्व और प्रतिरोध’ भारतीय समाज और संस्कृति के उन सुविधाजनक सवालों से टकराने के क्रम में लिखी गई है, जिनसे बचने का हर सम्भव प्रयास अब तक किया जाता रहा है। संस्कृति पर अमूर्तनों की भाषा में लिखे गए तमाम पोथों से भिन्न यह पुस्तक मोहक आवरणों से ढके छद्म को उद्घाटित करती है। बढ़ता साम्प्रदायिक ज़हर, शोषण के नए तरीक़े, कुर्सी हथियाने के लिए धर्म का सीढ़ी की तरह किया जानेवाला इस्तेमाल, स्त्री-दमन का अनवरत सिलसिला, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के ख़िलाफ़ जारी होनेवाले फ़तवे, उभरते दलित आन्दोलन को नाकाम करने में लगी अमानुषिक ताक़तें और मानवीय संवेदनातंत्र के निरन्तर छीजते जाने की प्रक्रिया—ये अब हमारे समय की कटु वास्तविकताएँ हैं। ईमानदार रचनाधर्मी मानस ने इन सभी मुद्दों को इस पुस्तक में उठाया है, सरलीकरणों से बचने की सफल कोशिश की है और इन प्रश्नों से जुड़ी प्रचलित प्रगतिशील व्याख्याओं की जाँच भी की है। सुपरिभाषित सांस्कृतिक प्रतीकों को पुरुषोत्तम अग्रवाल ने नई दृष्टि से विश्लेषित करने का प्रयास किया है। कहने की आवश्यकता नहीं कि इसी कारण यह पुस्तक हमारे परम्परागत संस्कारों, स्वीकृत मूल्यों और प्रश्नातीत बना दी गई आस्थाओं को झकझोर देने में समर्थ हो सकेगी।\u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003eअपने भाषिक रचाव में यह पुस्तक विशिष्ट है। विचारगत नवीनता भाषा का नया तेवर चाहती है, जिसे डॉ. अग्रवाल ने सघन सर्जनात्मकता में अर्जित किया है। मधुर पदबन्धों के आदी हो चुके लोगों को इसमें ज़रूरी औषधीय कड़वाहट मिलेगी, साथ ही आद्यन्त कवि-सुलभ रससिक्तता भी।\u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003eतथाकथित ‘जातिवाद’ के सामाजिक-राजनीतिक निहितार्थों की सर्वथा नई व्याख्या और वर्णाश्रम के सांस्कृतिक अर्थ का विचारोत्तेजक रेखांकन इस पुस्तक के तर्क की अपनी विशेषताएँ हैं।\u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003eसमाज, संस्कृति और सर्जनात्मकता का गतिशील परिप्रेक्ष्य विकसित करने की बौद्धिक बेचैनी से भरपूर यह किताब उन सबके लिए ज़रूरी है, जो भारतीय समाज के अन्तर्निहित वर्चस्वतंत्र से जिरह करना चाहते हैं।\u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003e \u003c\/p\u003e","brand":"Rajkamal Prakashan","offers":[{"title":"Paperback","offer_id":45285703811223,"sku":"9789393768131","price":175.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0666\/3471\/1191\/files\/9789393768131.webp?v=1769284112","url":"https:\/\/atlanticbooks.com\/products\/sanskriti-varchswa-aur-pratirodh-9789393768131","provider":"Atlantic Books","version":"1.0","type":"link"}