{"product_id":"shabdon-ke-digvijay-9789371123037","title":"Shabdon Ke Digvijay","description":"\u003cp\u003e • Author(s): Rajkumar Digvijay\u003cbr\u003e • Publisher: Vani Prakashan\u003cbr\u003e • Publisher Imprint: Vani Prakashan\u003cbr\u003e\u003c\/p\u003e\u003cp\u003eशब्दों के दिग्विजय' राज कुमार दिग्विजय की एक बहुपरतीय कृति है जो व्यंग्य, डायरी, संस्मरण और लेखों से पूरित है। यह संग्रह समकालीन भारतीय समाज की विसंगतियों और विडम्बनापूर्ण यथार्थ का बेबाक, धारदार और व्यंग्यात्मक चित्रण प्रस्तुत करता है। इस पुस्तक की रचनाओं में एक ऐसा तीव्र आत्मचिन्तन है जो हमारे जीवन, समाज, व्यवस्था, सम्बन्धों और मान्यताओं के उन पहलुओं पर करारी चोट करता है, जिन्हें हमने सहज स्वीकार लिये हैं।पुस्तक के पहले खण्ड 'चिन्तन से चोट' में व्यंग्य-रचनाएँ हैं जो पर्यावरण-विनाश, स्वास्थ्य-शिक्षा की असलियत और मानवीय संवेदनाओं के क्षरण पर गहरा कटाक्ष करती हैं। 'रामबाण' और 'बुखार अच्छे हैं।' जैसी रचनाएँ जहाँ चिकित्सा-व्यवस्था के बाज़ारूपन पर करारी टिप्पणी करती है, वहीं 'गौरैया अब आँगन में नहीं चहकती' और 'जरूरी है सह-अस्तित्व' में विकास की आँधी में प्रकृति के हास की असह्य तस्वीरें उभरती हैं। 'प्रेम पर कानूनी पहरा' और 'स्वार्थी मानव-निःस्वार्थ प्रेम' हमारे सामाजिक- सांस्कृतिक ढाँचे में पनपती कृत्रिमता और भावनात्मक ठण्डक को उघाड़ती हैं।दूसरे खण्ड 'सोच-विचार' में लेखक ने अपनी व्यंग्य-रचनाओं के जरिये भारतीय समाज की गहराई से पड़ताल की है। 'बहुरि बन्दि खल गन सतिभाएँ' से लेकर 'रंक चले सिर छत्र धराई' तक, हर रचना व्यवस्था, जातिगत विद्रुपताओं, खेती की उपेक्षा और तकनीकी अन्धश्रद्धा की परतें उधेड़ती है। 'कहाँ से आयी जाति-व्यवस्था' और 'टी फ़ॉर टोमेटो' में इतिहास और वर्तमान का ऐसा समन्वय मिलता है जो पाठक को सोचने पर विवश करता है।तीसरे खण्ड 'डायरी के पन्नों से' में आत्मीय और गद्यात्मक शैली में जीवन के विविध पक्षों नशे की सामाजिक सच्चाइयों, स्वास्थ्य की उपेक्षा, जैविक खेती, जल-संकट जैसे गम्भीर विषयों को सहज लेकिन गहरे भाव से प्रस्तुत किया गया है। लेखक का यह डायरी-लेखन अनुभव और आत्ममन्थन का वह सार है, जिससे अपने युग और जगत् का बहुत कुछ जाना-समझा जा सकता है।'कोविड की 'काल' कोठरी से' पुस्तक का चौथा खण्ड है जिसमें सम्मिलित लेख महामारी के भय, भाषाई उलझनों, चिकित्सा घाँधलियों और सामाजिक व्यवहार पर अत्यन्त मार्मिक हैं। लेखक ने भय और बीमारी से कहीं अधिक सामाजिक बेहोशी और नीति-व्यवस्था की नाकामी को उजागर किया है।अन्तिम खण्ड 'यादों के बहाने...' में दो मार्मिक संस्मरण हैं- 'अरुण जेटली' और 'खामोश हो गयी जादुई आवाज'। ये संस्मरण प्रसिद्ध राजनेता अरुण जेटली और रेडियो उद्घोषक अमीन सयानी पर न केवल श्रृद्धांजलि स्वरूप हैं बल्कि उस जीवन-दृष्टि और संवेदनशीलता की दस्तावेज़ हैं, जो आज के समय में विलुप्तप्राय होती जा रही है।इस तरह देखें तो 'शब्दों के दिग्विजय' व्यंग्य सहित अन्य विधाओं से सृजित हमारे समय और समाज का एक आईना है-कहीं धुँधला, कहीं चटख; जो हमें कभी हास्य में रँगते व्यथित करता है और व्यथित करते सोचने पर मजबूर। निस्सन्देह, यह कृति पाठकों को गुदगुदाती ही नहीं, झकझोरती भी है, और यही इसकी सबसे बड़ी सफलता है।\u003c\/p\u003e","brand":"Vani Prakashan","offers":[{"title":"Hardcover","offer_id":46523122778263,"sku":"9789371123037","price":257.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0666\/3471\/1191\/files\/9789371123037.webp?v=1767180134","url":"https:\/\/atlanticbooks.com\/products\/shabdon-ke-digvijay-9789371123037","provider":"Atlantic Books","version":"1.0","type":"link"}