{"product_id":"sinhapura-dweep-desh-ka-pravasi-gadya-9789369448838","title":"Sinhapura: Dweep Desh ka Pravasi Gadya","description":"\u003cp\u003e • Author(s): Ed. by Divya Mathur | Sandhya Singh\u003cbr\u003e • Publisher: Vani Prakashan\u003cbr\u003e • Publisher Imprint: Vani Prakashan\u003cbr\u003e • BISAC: Personal Memoirs\u003c\/p\u003e\u003cp\u003eसिंगापुर में हिन्दी भाषा, हिन्दी शिक्षण, और प्रवासी साहित्य से सम्बन्धित गतिविधियाँ कई अन्य देशों के मुक़ाबले मात्रा और गुणवत्ता दोनों दृष्टियों से उच्चतर स्तर पर हैं, लेकिन विभिन्न कारणों से हिन्दी-कर्मियों का ध्यान इस पर नहीं गया। यहाँ प्रवासी साहित्य न केवल विपुल मात्रा में लिखा जा रहा है, बल्कि यह विविध विधाओं में भी लिखा जा रहा है और इसमें हमें अनछुए विषय भी दिखाई देते हैं। यहाँ हिन्दी में जीवन को दिशा देने का साहित्य भी दिखाई देता है, ऑनलाइन और ऑफ़लाइन चर्चा और कार्यक्रम आयोजित किये जाते हैं, और सांस्कृतिक कार्यक्रमों में किशोर-युवा-वयस्क सभी लोग सक्रियता से भाग लेते हैं। इसी सबकी बानगी लिए है, सिंगापुर का यह प्रथम गद्य संग्रह ‘सिंहापुरा’, जिसमें संस्मरण और यात्रा-वृत्तान्त शामिल किये गये हैं। ये रचनाएँ हमें जीवन के अनुभूत विषयों में ले जाती हैं और आत्मीयता, प्रेरणा, संघर्ष और जिजीविषा का परिचय देती हैं। विशेष बात यह है कि इन लेखकों में से अनेक का कार्यजगत हिन्दी भाषा से जुड़ा हुआ नहीं है, और इसलिए यह न केवल हिन्दी के प्रति उनके जुनून को दर्शाता है, बल्कि इसी कारण हमारे समक्ष विषयों, प्रसंगों और अनुभवों का विस्तृत और अब तक अपरिचित फलक भी उद्घाटित करता है। डॉ. संध्या सिंह सिंगापुर में हिन्दी और भारतीय संस्कृति के प्रचार-प्रसार में दशकों से कटिबद्ध हैं और यह हर्ष का विषय है कि उनके सद्प्रयास सार्थक रूप में फलीभूत हो रहे हैं।- प्रो. राजेश कुमारवरिष्ठ साहित्यकार और भाषा-कर्मी★★★आद्या अचानक बहुत चिन्ताग्रस्त दिखाई देने लगी, हर समय अपने हाथ धोती रहती और आस-पास की वस्तुओं को छूने से कतराती। मुझे और मयंक को लगा शायद परीक्षा पास आ रही है इसलिए चिन्तित है लेकिन जब तक हमें समझ आता, आद्या को ओ.सी.डी. (Obsessive Compulsive Disorder) पूरी तरह अपनी गिरफ्त में कर चुका था।- दूसरी उड़ान से★★★सिंगापुर के आवासीय परिसर के तरणताल के पास की कुर्सी पर काले रंग की जींस और सफ़ेद टीशर्ट पहने इतराकर बैठी नीमा। एक पहेली थी नीमा जो अपने पीछे कई सवाल छोड़ गयी। कहाँ से आयी थी ये तो पता था पर कहाँ गयी इसके बारे में मात्र अनुमान ही लगा सकती हूँ। दावे के साथ नहीं कह सकती।- कहाँ गयी नीमा? से★★★वापस एयरपोर्ट पर खड़ा हूँ और सोच रहा हूँ बिटिया के लिए कुछ ले लूँ। एक लकड़ी का छोटा-सा खिलौना लेता हूँ, पत्नी के लिए कान की बालियाँ और निज के लिए एक मैग्नेट। अपने लिए तो इतना कुछ लिया है मैंने- मुस्कुराते चेहरे, ज़्यादा दिये गये पैसो, वो लाल ड्रेस वाली टैक्सी ड्राइवर और वो बिन्दी वाली रेस्तराँ की वेटर। मकाती की कीचड़ वाली और रौशन सड़कें और बी.जी. सी. की आधुनिकता।मनीला : एक मुस्कुराता शहर से★★★उन धुंधली पड़ती यादों की परछाइयाँ आज भी मेरे मन-मस्तिष्क से नहीं गयीं। लोग कहते हैं कि ये सब दिमाग़ की खुराफ़ातें हैं और कुछ नहीं। कुछ का कहना है कि यह सब 'पावर ऑफ़ सजैशन' का कमाल है। भला इतनी छोटी उम्र में कब, कैसे और किसने मेरे दिमाग़ में ऐसे रंग-बिरंगे दृश्य भर दिये होंगे?- मायाजाल से★★★मेरे घर की दहलीज़ एक ऐसा स्थान है जहाँ मैं अपने फुर्सत के पल गुज़ारा करती हूँ। राहगीरों की भीड़ कभी मेरा आकर्षण खींचती है तो कभी सुनसान सड़क की ख़ामोशी के पीछे छिपी कहानियाँ मुझे अतीत में खड़ा कर देती हैं, कारण अतीत की स्मृतियाँ हमारे वर्तमान क्षणों को सुख जो पहुँचाती हैं। उस दहलीज़ की एक और कथा कि मैं अपने जीवन की सभी योजनाएँ यहीं सँभालती हूँ। -चक्षुदर्शन से अभिप्रेरणा से\u003c\/p\u003e","brand":"Vani Prakashan","offers":[{"title":"Paperback","offer_id":46523048722583,"sku":"9789369448838","price":237.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0666\/3471\/1191\/files\/9789369448838.webp?v=1767179707","url":"https:\/\/atlanticbooks.com\/products\/sinhapura-dweep-desh-ka-pravasi-gadya-9789369448838","provider":"Atlantic Books","version":"1.0","type":"link"}