{"product_id":"sngraam-sangram-9788121265638","title":"संग्राम (Sangram)","description":"\u003cp\u003e • Author(s): प्रेमचन्द (Premchand)\u003cbr\u003e • Publisher: Gyan Publishing House\u003cbr\u003e • Publisher Imprint: Gyan Publishing House\u003cbr\u003e\u003c\/p\u003e\u003cp\u003eपुस्तक के बारे में -ः ‘संग्राम’ प्रेमचंद द्वारा लिखित नाटक है। प्रेमचन्द मूलतः कथाकार थे, लेकिन उन्होंने कुछ नाटक भी लिखे हैं, संग्राम नाटक में प्रेमचंद ने पहली बार और शायद आखिरी बार गीतात्मक शैली का इस्तेमाल किया है। प्रेमचंद ने प्रयोग के तौर पर इस शैली का इस्तेमाल किया है। नाटक की मूल भूमि सामंती परिवेश और हमारा समाज है। जहाँ सामंतों की ज्यादती और मजदूर-किसान की लाचारी है। नाटक में प्रेम की नाटकीयता भी दिखाई गई है और यहीं नाटकीयता पूरे नाटक को एक मुकाम तक पहुँचाती है। इस प्रेम में मन की शुद्धता नहीं, यह कुंठित विचार हैं, जो आचरण के छल से पैदा होते हैं। प्रेमचंद ने अपनी पूरी कथा-यात्रा में स्त्री-चरित्र को सशक्त और धर्म-रक्षक बनाया है। इस नाटक की नायिका भी बड़ी सावधानी से अपने धर्म की लाज रखती है। इस नाटक में सामंती समाज का एक सकारात्मक चेहरा भी उजागर किया गया है। नाटक में नायक और नायिका दोनों अधर्म और कुरीति के मार्ग पर उतरते हैं लेकिन लेखक ने बड़ी सफाई ने दोनों को बचाया है। दोनों का धर्म बचा रहता है। मजदूर चेतना, किसान चेतना को सचेत रुप से प्रस्तुत किया गया है। २० वीं शताब्दी के तीसरे-चौथे दशक के समाज की यथार्थ परक झांकी इस नाटक के माध्यम से प्रस्तुत की गई है।\u003c\/p\u003e","brand":"Gyan Publishing House","offers":[{"title":"Paperback","offer_id":46194891391127,"sku":"9788121265638","price":84.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0666\/3471\/1191\/files\/9788121265638.webp?v=1769299311","url":"https:\/\/atlanticbooks.com\/products\/sngraam-sangram-9788121265638","provider":"Atlantic Books","version":"1.0","type":"link"}