{"product_id":"thapak-thapak-dil-thapak-thapak-9789360866266","title":"Thapak Thapak Dil Thapak Thapak","description":"\u003cp\u003e • Author(s): Gagan Gill\u003cbr\u003e • Publisher: Rajkamal Prakashan\u003cbr\u003e • Publisher Imprint: Rajkamal Prakashan\u003cbr\u003e\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003c\/p\u003e\u003cp\u003eभाषा के छंद और स्वच्छंद के बीच से अपना रास्ता बनातीं गगन गिल की ये कविताएँ न केवल उनकी अपनी रचना-यात्रा का, बल्कि आधुनिक हिंदी कविता का भी एक नया पड़ाव मानी गयीं। इस संग्रह के साथ, कह सकते हैं कि, हिंदी कविता में लय का संताप और संताप की लय इतनी मुखर होकर लौटी।\u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003eगगन गिल का केंद्रीय सरोकार मानव-नियति का दुख रहा है। कभी वह उन्हें शोकगीतों तक ले गया है और कभी बौद्ध दर्शन तक। उन्होंने इस विषय को इतनी विविध तरह से टटोला है, गोया दुख ईश्वर जैसे किसी मूर्तिकार का कोई शिल्प हो। इस प्रक्रिया में उन्होंने जिस चीज़ को एक औज़ार की तरह बरता है वह है भाषा और कहन का शिल्प।\u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003e‘थपक थपक दिल थपक थपक’ की संश्लिष्ट बुनावट भाषा-प्रयोग में एक घटना की तरह है। किसी स्थिति-विशेष को भाषा (की चाबी) से खोलते हुए, फिर भाषा को लय से, लय को शब्द-आवृत्ति से और शब्द-आवृत्ति से मौन को, अबोले को उघाड़ते-उलीचते ये रचनाएँ एक अनूठी संरचना गढ़ती हैं जो हमें कविता के उत्स की अनुभूति कराती है। दुःख की पहली आह की तरह।\u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003eये कविताएँ दुर्बोध दीखती हैं, हैं नहीं। सरल जान पड़ती हैं, निकलती नहीं। वे अर्थ-विशेष के आशय से बार-बार फिसलती हैं और इस विचलन में ही अर्थवान होने का स्वप्न रचती हैं, इस आकांक्षा में, कि यदि कहीं कोई तत्त्व है, तो वह भाषा और शब्दार्थ से परे है जिसे जानना उतना ज़रूरी नहीं जितना महसूस करना और आत्मसात करना।\u003c\/p\u003e","brand":"Rajkamal Prakashan","offers":[{"title":"Paperback","offer_id":45285674942615,"sku":"9789360866266","price":175.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0666\/3471\/1191\/files\/9789360866266.webp?v=1769284037","url":"https:\/\/atlanticbooks.com\/products\/thapak-thapak-dil-thapak-thapak-9789360866266","provider":"Atlantic Books","version":"1.0","type":"link"}