{"product_id":"udaasi-ka-dhrupad-9788196120665","title":"Udaasi Ka Dhrupad","description":"\u003cp\u003e • Author(s): Rajendra Kumar\u003cbr\u003e • Publisher: Lokbharti Prakashan\u003cbr\u003e • Publisher Imprint: Lokbharti Prakashan\u003cbr\u003e\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003c\/p\u003e\u003cp\u003eराजेन्द्र कुमार के इस संग्रह में उनके पिछले संग्रहों से कुछ अलग मनःस्थिति की कविताएँ हैं—ऐसी खिड़कियों की तरह, जो बाहर से ज्यादा, कवि के अपने भीतर की ओर खुलती हैं। कुछ-कुछ मीर की तरह की अपनी विकलता में 'ये धुआँ कहाँ से उठता है' की सुरागरसी-सी करती हुई।\u003cbr\u003eहमारा समय गुरूर में है कि उसने मनुष्य को क्या- क्या नहीं बख्शा है। 'मनुष्यता' उदास है कि वह किस क़दर अकेली होती जा रही है। जीवन में बहुत कुछ है— काम्य-अकाम्य। ये कविताएँ काम्य- अकाम्य के ऐसे संधिस्थल की कविताएँ हैं, जहाँ आशा-निराशा, अँधेरा- उजाला जैसे परस्पर विलोमार्थी से प्रतीत होने वाले शब्द भी आपस में संवाद करने को विकल हैं कि आज की चकाचौंध- भरी चहल-पहल में घिरे मनुष्य के संदर्भ में क्या अर्थ दें, अकेली पड़ती जाती 'मनुष्यता' के पक्ष में क्या अर्थ दें। अकारण नहीं है कि कवि को अंधेरा कभी रोशनी से अधिक अकुंठ लगने लगता है और उदासी अधिक संवेदनशील और उम्मीदभरी लगती है कि 'अकेला नहीं हूँ मैं'। यह उदासी का ध्रुपद है, जिसके आलाप में प्रिय के 'न होने में भी होने की अनुभूति की लय है।\u003c\/p\u003e","brand":"Lokbharti Prakashan","offers":[{"title":"Paperback","offer_id":45285568807063,"sku":"9788196120665","price":207.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0666\/3471\/1191\/files\/9788196120665.webp?v=1769283772","url":"https:\/\/atlanticbooks.com\/products\/udaasi-ka-dhrupad-9788196120665","provider":"Atlantic Books","version":"1.0","type":"link"}