{"product_id":"ullanghan-9789390971824","title":"Ullanghan","description":"\u003cp\u003e • Author(s): Rajesh Joshi\u003cbr\u003e • Publisher: Rajkamal Prakashan\u003cbr\u003e • Publisher Imprint: Rajkamal Prakashan\u003cbr\u003e\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003c\/p\u003e\u003cp\u003eउल्‍लंघन संग्रह में कवि हुक्म-उदूली की अपनी प्राकृतिक इच्छा से आरम्भ करते हुए मौजूदा दौर की उन विवशताओं से अपनी असहमति और विरोध जताता है, जिन्हें सत्ता हमारी दिनचर्या का स्वाभाविक हिस्सा बनाने पर आमादा है।\u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003eएक ऐसे समय में ‘जिसमें न स्मृतियाँ बची हैं\/न स्वप्न और जहाँ लोकतंत्र एक प्रहसन में बदल रहा है\/एक विदूषक किसी तानाशाह की मिमिक्री कर रहा है’—ये कविताएँ हमें निर्प्रश्न अनुकरणीयता के मायाजाल से निकलने का रास्ता भी देती हैं, और तर्क भी।\u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003eकवि देख पा रहा है कि ‘सिकुड़ते हुए इस जनतंत्र में सिर्फ़ सन्देह बचा है’, ताक़त के शिखरों पर बैठे लोग नागरिकों को शक की निगाह से देखते हैं, तरह-तरह के हुक्मों से अपने को मापते हैं; कहते हैं कि साबित करो, तुम जहाँ हो वहाँ होने के लिए कितने वैध हो, और तब कविता जवाब देती है–‘ओ हुक्मरानो\/मैं स्वर्ग को भूलकर ही आया हूँ इस धरती पर\/तुम अगर मुझे नागरिक मानने से इनकार करते हो\/तो मैं भी इनकार करता हूँ \/इनकार करता हूँ तुम्हें सरकार मानने से!’\u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003eलगातार गहरे होते राजनीतिक-सामाजिक घटाटोप के विरुद्ध पिछले चार-पाँच सालों में जो स्वर मुखर रहते आए हैं, राजेश जोशी उनमें सबसे आगे की पाँत में रहे हैं। इस संग्रह की ज़्यादातर कविताएँ इसी दौर में लिखी गई हैं। कुछ कविताएँ महामारी के जारी दौर को भी सम्बोधित हैं जिसने सामाजिक ताने-बाने को छिन्न-भिन्न करने के सरकारी उद्यम पर जैसे एक औपचारिक मुहर ही लगा दी–‘सारी सड़कों पर पसरा है सन्नाटा\/बन्द हैं सारे घरों के दरवाज़े\/एक भयानक पागलपन पल रहा है दरवाज़ों के पीछे\/दीवार फोड़कर निकल आएगा जो\/किसी भी समय बाहर\/और फैल जाएगा सारी सड़कों पर!’\u003c\/p\u003e","brand":"Rajkamal Prakashan","offers":[{"title":"Paperback","offer_id":45285622153367,"sku":"9789390971824","price":112.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0666\/3471\/1191\/files\/9789390971824.webp?v=1769283904","url":"https:\/\/atlanticbooks.com\/products\/ullanghan-9789390971824","provider":"Atlantic Books","version":"1.0","type":"link"}