{"product_id":"vahan-tak-pahuchane-ki-daur-9788171190409","title":"Vahan tak pahuchane ki daur","description":"\u003cp\u003e • Author(s): Rajendra Yadav\u003cbr\u003e • Publisher: Radhakrishna Prakashan\u003cbr\u003e • Publisher Imprint: Radhakrishna Prakashan\u003cbr\u003e\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003c\/p\u003e\u003cp\u003eराजेन्द्र यादव अपने दौर के विशिष्ट और महत्त्वपूर्ण रचनाकार ही नहीं, नई कहानी आन्दोलन के प्रतिनिधि लेखक भी हैं। विगत कुछ वर्षों में राजेन्द्र यादव का रचनात्मक लेखन बहुत ही सीमित रहा है, परन्तु उनकी सक्रियता सदा बनी रही है। अपने लेखों, बहसों व ‘हंस’ के माध्यम से वह एक रचनात्मक माहौल तैयार करने की दिशा में ही सक्रिय नहीं रहे हैं, बल्कि लगभग सभी सामयिक, राजनीतिक और सामाजिक समस्याओं में एक जीवन्त हस्तक्षेप करते रहे हैं।\u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003eवैसे भी किसी लेखक की सार्थकता अन्ततः इस बात में नहीं है कि उसने कितना लिखा, बल्कि इस बात में है कि उसने क्या लिखा और समाज तथा साहित्य विशेष के सन्दर्भ में उस लेखन का महत्त्व व भूमिका क्या रही। राजेन्द्र यादव की कहानियाँ बदलते सन्दर्भों में अपनी सार्थकता तथा ‘रिलीवेंस’ खोजते पात्रों के ऊहापोह, द्वन्द्व व आत्म-संघर्ष का लेखा-जोखा हैं। चूँकि राजेन्द्र यादव के पात्र अधिकांशतः मध्यवर्ग से सम्बन्धित हैं, सम्भवतः इसीलिए उनमें एक विशिष्ट क़िस्म की बौद्धिक ऊर्जा का भास है। यह वह वर्ग है, जो अपने कार्य-कलाप और मानसिकता से बदलते यथार्थ का गहरा अहसास ही नहीं कराता, बल्कि इस बात का भी संकेत देता है कि यह समाज आख़िर जानेवाला किस दिशा में है।\u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003eराजेन्द्र यादव की कहानियों को पढ़ना, नई कहानी की सामान्य प्रवृत्ति के अलावा कहीं आगे जाकर एक सजग और संवेदनशील रचनालोक से गुज़रना है, जिसमें भावुकता का अनियंत्रित व असन्तुलित प्रवाह न होकर (जो नई कहानी के रचनाकारों में दोष की हद तक है) एक सजग व नियंत्रित ‘इंटरप्ले’ देखने को मिलता है और यह किसी सिद्धहस्त रचनाकार की क़लम से ही सम्भव हो सकता है।\u003c\/p\u003e","brand":"Radhakrishna Prakashan","offers":[{"title":"Hardcover","offer_id":45285535907991,"sku":"9788171190409","price":347.0,"currency_code":"INR","in_stock":false}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0666\/3471\/1191\/files\/9788171190409.webp?v=1769283712","url":"https:\/\/atlanticbooks.com\/products\/vahan-tak-pahuchane-ki-daur-9788171190409","provider":"Atlantic Books","version":"1.0","type":"link"}