{"product_id":"vyang-pachisi-9789373176178","title":"Vyang Pachisi","description":"\u003cp\u003e • Author(s): Suresh Patwa\u003cbr\u003e • Publisher: Manjul Publishing House\u003cbr\u003e • Publisher Imprint: Sarvatra\u003cbr\u003e\u003c\/p\u003e\u003cp\u003eसुरेश पटवा की व्यंग्य रचनाओं को पढ़ते हुए स्वाभाविक रूप से महसूस होता है कि लिखते समय अभिव्यक्ति का जो साहित्यिक आवेग लेखक पर हावी होता है, वह उसके विचारों, धारणाओं, मान्यताओं और अंतर्द्वद्वों को स्पष्ट कर देता है। जिसकी छाया में किसी घटना या प्रति-घ में व्याप्त बिडंबनाओं, विसंगतियों, विद्रूपों और विरोधाभासों को रेखांकित करने के साथ-साथ उसमें अंतर्निहित पाखंड पर जबरदस्त प्रहार करने के हौंसलों के साथ वह उन्मुख होता है और इस प्रकटीकरण के लिए जिस भाषा या लहजे का इस्तेमाल करता है उसमें व्यंग्यात्मकता सहज रूप से आ ही जाती है। इस पुस्तक की रचनाओं को सहज व्यंग्य कह सकते हैं, क्योंकि उनमें दिमाग़ की ग़ैरज़रूरी मशक्कत नहीं है बल्कि एक धड़कते दिल का वह बयान किश्त दर किश्त है जो समाज में पाए जाने वाले किसी भी क़िस्म के अन्याय, अनाचार, असंवेदन और अशोभनीय के विरुद्ध समय की खाताबही में बहुत शिद्दत के साथ दर्ज किया जा रहा है।संकलन में सम्मिलित व्यंग्य की भाषा में सहजता है, शैली में चुटीलापन है और साथ ही दृष्टि में जन- सरोकारों की स्पष्टता दृष्टव्य है। कहीं राजनीतिक छल-प्रपंच पर कटाक्ष है, तो कहीं सामाजिक ढकोसलों पर करारी चोट, कहीं दफ़्तरों की नौकरशाही मानसिकता को तो कहीं आम आदमी की उलझनों को हास्य- व्यंग्य के रंग में ढाला गया है। यह संग्रह महज़ शब्दों का विनोद नहीं है, बल्कि एक सजग लेखक की दृष्टि से समाज का आईना है।\u003c\/p\u003e","brand":"Manjul Publishing House","offers":[{"title":"Paperback","offer_id":46849112539287,"sku":"9789373176178","price":163.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0666\/3471\/1191\/files\/9789373176178.webp?v=1769596043","url":"https:\/\/atlanticbooks.com\/products\/vyang-pachisi-9789373176178","provider":"Atlantic Books","version":"1.0","type":"link"}