{"product_id":"yaron-ke-yar-dushyant-kumar-9789362877505","title":"Yaron Ke Yar Dushyant Kumar","description":"\u003cp\u003e • Author(s): Ed. by Vijay Bahadur Singh\u003cbr\u003e • Publisher: Vani Prakashan\u003cbr\u003e • Publisher Imprint: Vani Prakashan\u003cbr\u003e • BISAC: Personal Memoirs\u003c\/p\u003e\u003cp\u003eहुआ कुछ यूँ कि दुष्यन्त कुछ देर से कॉलेज में आया। अतः क्लास में नयी शक्ल का परिचय 'शील' जी ने माँगा। देखा पीछे एक गोरा चिट्टा, छरहरा, ख़ूबसूरत, कुर्ता-पजामा और टोपी में खड़ा हुआ लड़का अध्यापक से मुखातिब हो रहा है—“मैं ज़िला बिजनौर के उस क्षेत्र का निवासी हूँ जहाँ कण्व के आश्रम में दुष्यन्त और शकुन्तला की प्रणय लीला हुई थी और इत्तफ़ाक से मेरा नाम भी दुष्यन्त ही है।\" वाक्य के समाप्त होते-होते उसकी दृष्टि अध्यापक से हटकर छात्रों की ओर पहुँच चुकी थी और इससे पहले कि अध्यापक महोदय कुछ बोल पायें, उसकी अदा में बाँकपन आया, दृष्टि छात्राओं पर जमी और अगला वाक्य चल पड़ा—“परदेसी उपनाम से कविता लिखता आपके लिए अब तक हूँ भी परदेसी ही, किन्तु आगे परदेसी नहीं रहूँगा, 'प्रियतम' बन जाने का इरादा है।\" सुनते हुए लड़कियों की आँखें मेज़ों पर घूर कर मुस्कराने लगीं, लड़कों के ठहाकों से कमरा गूँज उठा और शील जी के मुख से 'अच्छा-अच्छा' के साथ अध्यापन शुरू हो गया। आगे चल कर तो शील जी ने हम दोनों को 'विद्वान' की उपाधि प्रदान करने के साथ-साथ, उपस्थितियों के झंझट से आश्वस्त करके क्लास से पूरी तरह छुट्टा रहने का आग्रहपूर्ण आदेश दे दिया था, जिसे हम लोगों ने गुरु के अनुग्रह में सहर्ष शिरोधार्य कर उन्हें अपनी अनुपस्थिति की गुरु दक्षिणा देकर स्थायी प्रसन्नता का अधिकारी बना दिया था।—इसी पुस्तक से\u003c\/p\u003e","brand":"Vani Prakashan","offers":[{"title":"Hardcover","offer_id":46523143028887,"sku":"9789362877505","price":322.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0666\/3471\/1191\/files\/9789362877505.webp?v=1767180248","url":"https:\/\/atlanticbooks.com\/products\/yaron-ke-yar-dushyant-kumar-9789362877505","provider":"Atlantic Books","version":"1.0","type":"link"}