{"product_id":"yeh-bhumandal-ki-raat-hai-9788126716692","title":"Yeh Bhumandal Ki Raat Hai","description":"\u003cp\u003e • Author(s): Pankaj Rag\u003cbr\u003e • Publisher: Rajkamal Prakashan\u003cbr\u003e • Publisher Imprint: Rajkamal Prakashan\u003cbr\u003e\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003c\/p\u003e\u003cp\u003eकविता की यात्रा में अकसर ही कुछ ऐसा होता है जो छूटता जाता है, उसी को समेटते-सहेजते हुए फिर एक और कवि आता है, और समकालीन रचनात्मकता के अधूरे परिदृश्य को पूरा करता है।\u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003eपंकज राग का यह संग्रह और उनकी कविताएँ यही काम करती दिखती हैं। न सिर्फ़ विषयों और शीर्षकों में, बल्कि भाषा के प्रयोग और बिम्बों-प्रतीकों के मुखौटों में भी वे उन चीज़ों और भंगिमाओं को पकड़ने की कोशिश करते हैं जो सिर्फ़ उनकी अपनी खोज हैं। “दिन बड़ा अजीब-सा गुज़रे\/शाम बड़ी थकी-थकी-सी हो\/भूख हो पर लगे नहीं\/हरारत हो पर दिखे नहीं\/बातें सतरंगी करो\/यह भूमंडल की रात है।” संग्रह की पहली और शीर्षक-कविता की शुरुआती ये पंक्तियाँ कवि की विशिष्टता की भूमिका की तरह पाठक के मन में गड़ जाती हैं, जिसका निर्वाह यह संग्रह अन्त तक करता है।\u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003eपंकज राग की ये कविताएँ उन चिन्ताओं को तो देखती ही हैं जो आज हम सबके लिए निर्णायक विषय बनी हुई हैं, साथ ही वे उन पीड़ाओं को भी अनदेखा नहीं करतीं जो हमारे अतीत में गुज़री हैं और आज हमारी स्मृतियों में कसकती हैं। ‘दिल्ली : शहर-दर-शहर’ जो इस संग्रह की सबसे लम्बी कविता है, वर्तमान और अतीत का ऐसा ही महाआख्यान बुनती है, जिसमें कवि एक शहर की नियति के बहाने मनुष्य की ही नियति से दो-चार होता है। “तुम मुझे फ़ीरोज़ी बना दो\/दिल्ली की उस मध्यवर्गीय लड़की ने अपने पास बैठे लड़के से कहा\/कोटला फ़ीरोज़शाह के स्लेटी खँडहरों के बीच\/उस लड़के का उत्तर फँस-सा गया\/फिर इन दोनों की कहानी का कुछ नहीं हुआ\/वैसे ही जैसे फ़ीरोज़ाबाद का भी कुछ न हो सका।”\u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003eअतीत से वर्तमान तक व्याप्त मनुष्य के अधूरेपन की निशानदेही करती ये कविताएँ निश्चित रूप से पाठकों के लिए एक अविस्मरणीय अनुभव साबित होंगी।\u003c\/p\u003e","brand":"Rajkamal Prakashan","offers":[{"title":"Hardcover","offer_id":45285584797847,"sku":"9788126716692","price":207.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0666\/3471\/1191\/files\/9788126716692.webp?v=1769283808","url":"https:\/\/atlanticbooks.com\/products\/yeh-bhumandal-ki-raat-hai-9788126716692","provider":"Atlantic Books","version":"1.0","type":"link"}