{"product_id":"zinda-hone-ka-sabut-9788126723652","title":"Zinda Hone ka Sabut","description":"\u003cp\u003e • Author(s): Jabir Husain\u003cbr\u003e • Publisher: Rajkamal Prakashan\u003cbr\u003e • Publisher Imprint: Rajkamal Prakashan\u003cbr\u003e • BISAC: General\u003c\/p\u003e\u003cp\u003e\u003c\/p\u003e\u003cp\u003eलोग कहते हैं, ‘सूरज को अँधेरी खाई में गिरते देखना अशुभ है।’ ‘अँधेरी खाई में कहाँ गिरता है सूरज। वह तो बस एक करवट लेकर हरे–भरे खेतों में उगी फ़सलों के बीच छिप जाता है, कुछ घंटों के बाद दोबारा अपना सफ़र शुरू करने के लिए। एक बार, आसमान पर छाये बादलों के एक आवारा टुकड़े ने खेतों की गोद में गिरते सूरज को पूरी तरह अपनी मुट्ठियों में बन्द कर लिया था। हम\u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003eदोनों कुछ लम्हों के लिए काँप गए थे। हमारे शहर का सूरज डूबने के पहले ही काले धब्बों की ओट में छिप गया था। मुझे नहीं मालूम, उस दिन और क्या हुआ था, पर मेरी और तुम्हारी आँखों ने कुछ लम्हों के बाद ही देखा कि सूरज आवारा बादलों की मुट्ठी से निकलकर दोबारा आसमान और ज़मीन जहाँ मिलते हैं, वहाँ दूर–दूर तक फैल गया और इसकी लाल–सुर्ख किरणों ने पूरे क्षितिज को अपने विशाल दायरे में समेट लिया।\u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003eजिन पाठकों ने जाबिर हुसेन की पिछली डायरियाँ पढ़ी हैं, उन्हें इस संकलन का नया कथा–शिल्प ज़रूर पसन्द आएगा।\u003c\/p\u003e","brand":"Rajkamal Prakashan","offers":[{"title":"Hardcover","offer_id":45285609570455,"sku":"9788126723652","price":210.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0666\/3471\/1191\/files\/9788126723652.webp?v=1769283871","url":"https:\/\/atlanticbooks.com\/products\/zinda-hone-ka-sabut-9788126723652","provider":"Atlantic Books","version":"1.0","type":"link"}