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Sahityik Parivesh Ke Vyangya

by Giriraj Sharan Agrawal
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Book cover type: Hardcover
  • ISBN13: 9788173151552
  • Binding: Hardcover
  • Subject: N/A
  • Publisher: Prabhat Prakashan Pvt. Ltd.
  • Publisher Imprint: Prabhat Prakashan Pvt. Ltd.
  • Publication Date:
  • Pages: 144
  • Original Price: INR 200.0
  • Language: Hindi
  • Edition: N/A
  • Item Weight: 200 grams
  • BISAC Subject(s): General

साहित्यिक परिवेश के व्यंग्यदूसरों का हाल तो हम जानते नहीं, लेकिन जहाँ तक हमारा सवाल है, साहित्यकार बनकर हम बहुत घाटे में रहे; यानी चक्कर में सदा दाल- आटे के रहे । हजारों-लाखों बार सोचा कि काश, हम साहित्यकार न हुए होते, किसी कार्यालय में अहलकार हो गए होते, किसी अधिकारी के पेशकार हो गए होते और यह भी संभव नहीं था तो किसी धनपति राजा- महाराजा के दरबार में चाटुकार ही हो गए होते । चाटुकारिता कुछ भी हो, लेकिन साहित्यकारिता की तुलना में कहीं अधिक लाभदायक होती है ।अपि अपने विरुद्ध बनाए गए किसी मुकदमे के सिलसिले में अदालत जाइए । आप देखेंगे कि वहाँ पेशकार नाम के सज्जन पूर्णरूप से ध्यानमग्न हुए अपनी कुरसी पर विराजमान हैं । वादियों - प्रतिवादियों की भीड़ सामने खड़ी हुई है । हरेक व्यक्‍त‌ि अपनी- अपनी कह रहा है, लेकिन वह किसी की भी नहीं सुनते हैं, अपने काम में व्यस्त हैं । वह जनवादी साहित्य नहीं, बल्कि कानूनवादी साहित्य रचने में जुटे हैं, और नजर उठाकर अपनी तरफ देखने को भी तैयार नहीं । जैसे-तैसे आप उनके निकट तक पहुँचते हैं और दस का नोट उनकी मुट्ठी में दबा देते हैं । तब वह झटपट कानूनवादी साहित्य रचकर फाइल आपकी ओर बढ़ा देते हैं कि दस्तखत करो ।साहित्यिक गतिविधियों और साहित्यकारों की परिस्थितियों पर प्रस्तुत ये सार्थक व्यंग्य आपको गुदगुदाएँगे भई और अंदर तक प्रहार भी करेंगे ।

गिरिराजशरण' जन्म : सन् 1944, संभल (उप्र.) डॉ. गिरिराज शरण की पहली पुस्तक सर 1964 में प्रकाशित हुई । तब से अनवरत साहित्य-साधना में रत आपकी लिखी एवं संपादित एक सौ के लगभग पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं । आपने साहित्य की प्राय: प्रत्येक विधा में साहित्य-सृजन किया है । हिंदी गजल में आपकी सूक्ष्म और धारदार सोच को गंभीरता से स्वीकार किया गया है ।कहानी, एकांकी, व्यंग्य, ललित निबंध और बाल साहित्य के लेखन में गतिपूर्वक सलग्न डॉ. गिरिराज वर्तमान में वर्धमान महाविद्यालय, बिजनौर (उप्र.) के स्नातकोत्तर एवं शोध विभाग में वरिष्‍ठ हिंदी प्रवक्‍ता हैं ।हिंदी शोध तथा संदर्भ-साहित्य की दृष्‍ट‌ि से प्रकाशित उनके विशिष्‍ट ग्रंथों- शोध-संदर्भ (तीन भाग), तुलसी मानस- संदर्भ तथा सूर साहित्य-संदर्भ-को गौरवपूर्ण स्थान प्राप्‍त है ।

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