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Udarikaran Ka Chyavanprash

by Shikhar Jain
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Book cover type: Hardcover
  • ISBN13: 9789386870049
  • Binding: Hardcover
  • Subject: N/A
  • Publisher: Prabhat Prakashan Pvt. Ltd.
  • Publisher Imprint: Prabhat Prakashan Pvt. Ltd.
  • Publication Date:
  • Pages: 112
  • Original Price: INR 300.0
  • Language: Hindi
  • Edition: N/A
  • Item Weight: 175 grams
  • BISAC Subject(s): General

हमारे कर्जदाताओं को हमारी नीतियों की आलोचना करने का अवसर मिल गया। उनके अध्ययन दलों ने हमारी औद्योगिक नीति को ठोका-बजाया और उसे दोषपूर्ण करार दिया। हमारी अर्थव्यवस्था को बारीकी से जाँचा-परखा और उसे बीमारी की ओर अग्रसर बतलाया। कहा कि यह मूलतः कठोर नियंत्रण का ही दुष्परिणाम था कि अर्थव्यवस्था पनप नहीं पाई, उद्योग अपने पाँवों पर खडे़ नहीं हो पाए। उन्होंने सलाह दी कि हम नियंत्रण की जगह उदारता से काम लें और अर्थव्यवस्था की सेहत सुधारने के लिए उदारीकरण के च्यवनप्राश का सेवन करें। शर्तिया लाभ होगा।मुझे यह सलाह कई नागवार गुजरी। उदारता का पाठ भला हमें कोई क्या पढ़ाएगा! इतिहास गवाह है कि हम आदिकाल से (अथवा अनादि काल से जो भी सही हो) ही इस कदर उदार रहे हैं कि यदि सपने में भी किसी को कुछ देने का वचन दे दें तो जागने पर बाकायदा उसे खोजकर हम वह वस्तु उसे सौंप देते हैं। ‘अतिथिदेवो भव’ की भावना हम पर इतनी हावी रही कि हम सदियों तक खिलजियों, लोदियों, मुगलों और अंग्रेजों द्वारा शासित रहे। लाखों याचक हमारी उदारता के चलते ही अपना पेट पालते हैं। फिर यह कैसे हो सकता है कि हम औद्योगिक क्षेत्र में उदार होने से चूक गए हों?

जन्म : मार्च १९४१ में मध्य प्रदेश के सागर जिले के गाँव लुहारी में।शिक्षा : इंजीनियरिंग कॉलेज, जबलपुर से सन् १९६३ में विद्युत् अभियांत्रिकी में स्नातक।सेवाकाल : जुलाई १९६३ से अक्तूबर १९९९ तक भिलाई इस्पात संयंत्र में विभिन्न विभागों में कार्यरत। ज्यादा समय राजहरा लौह अयस्क एवं नंदिनी लाइम स्टोन माइंस में।लेखन : पहली व्यंग्य रचना ‘भगवान् का खत’ सन् १९६५ में ‘सरिता’ के नवंबर द्वितीय अंक में प्रकाशित। सन् १९९९ में भिलाई इस्पात संयंत्र की सेवा से निवृत्त होने के बाद लेखन में पुनः सक्रिय।

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