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Apne Apne Daav

by Daya Prakash Sinha
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Book cover type: Hardcover
  • ISBN13: 9788181433145
  • Binding: Hardcover
  • Subject: N/A
  • Publisher: Vani Prakashan
  • Publisher Imprint: Vani Prakashan
  • Publication Date:
  • Pages: 104
  • Original Price: INR 295.0
  • Language: Hindi
  • Edition: 2nd Edition
  • Item Weight: 300 grams
  • BISAC Subject(s): General

मैं अपने लिखे नाटकों को सबसे पहले स्वयं ही मंच पर प्रस्तुत करता हूँ। स्वयं निर्देशित करता हूँ, या निर्देशन और प्रस्तुति से सम्बद्ध रहता हूँ। इसके द्वारा मैं नाटक का परीक्षण, विश्लेषण संशोधन, परिवर्धन एक निर्देशक की निगाह से करता हूँ। नाटक के रूप में अपने लिखे शब्दों, संवादों से कितना ही मोह क्यों न हो, निर्देशक के रूप में, मैं उनको निर्ममता से काटता छाँटता हूँ। निर्देशक के रूप में मेरा व्यक्तित्व नाटककार से एकदम अलग होता है। अतएव मैं अपने ही नाटक की मंच क्षमता के बारे में तटस्थ होकर एक अन्य व्यक्ति के समान टिप्पणी कर सकता हूँ। मैं इस नाटक की अनेक प्रस्तुतियों से सम्बद्ध रहा हूँ। दिल्ली और लखनऊ में कई प्रस्तुतियाँ कीं। 1976-79 के बीच में मैंने फीजी में इस नाटक के अनेक प्रदर्शन किये। सब ही प्रस्तुतियों में यह नाटक मंच पर खरा उतरा, दर्शकों को दो घंटे तक गुदगुदाता, और कभी-कभी खुल कर हँसाता रहा। इससे मैं इस नाटक की मंचीयता के प्रति आश्वस्त हूँ।कभी-कभी मंच प्रस्तुति के पश्चात् मुझे एक दो कुछ ‘ज़्यादा पढ़े' विद्वान और समीक्षक मिले, जिन्होंने मुझसे पूछा कि यह नाटक कहना क्या चाहता है? इस प्रश्न में यह अन्तर्निहित है कि हर नाटक को कुछ कहना चाहिए। हर नाटक में कोई सन्देश होना चाहिए, या ऐसा कुछ होना चाहिए जिससे कि दर्शक नाटक का सारांश निकाल सकें। या स्पष्ट शब्दों में नाटक में ऐसा कुछ होना चाहिए जिससे 'सामाजिक परिवर्तन' लाया जा सके। नहीं तो कुछ भारी भरकम शब्दों का जाल, नये से लगते विचारों का उलझाव, आयातित मानदण्डों पर खरी उतरती ऊलजलूलता (एबसडिटी)-कुछ तो हो। मैं उनसे क्या कहूँ। कुछ ज़्यादा ही 'पढ़े लिखे' होने के कारण वह मेरी बात शायद नहीं सुनेंगे। सुनेंगे भी तो न सुनने का नाटक करेंगे। शेक्सपियर का 'हेमलेट' क्या कहता है ? कालिदास का 'शकुन्तला' नाटक कौन से सामाजिक परिवर्तन का झण्डा ऊँचा करता है? मौलियर के नाटक कौन-सा गुरुगम्भीर विचार प्रतिपादित करते हैं? नाटक की सफल प्रस्तुति जिसमें अभिनेता और दर्शक बराबर की साझेदारी अनुभव करें, क्या नाट्य-उद्देश्य की चरम-प्राप्ति नहीं है?पूर्व - प्रस्तुतियों पर कुछ सम्मतियाँअपने शिष्ट हास्य, तीखे व्यंग, चुस्त संवादों, मनोरंजक स्थितियों एवं प्रभावशाली अभिनय से पूर्ण इस सुखांतक नाटक ने दर्शकों को अविस्मरणीय नाट्यानुभूति प्रदान की।—नवभारत टाइम्स, नयी दिल्लीलालच के रिश्तों में पड़ती दरारों की झलक देखी अपने-अपने दाँव में।—राष्ट्रीय सहारा, लखनऊनाटक अपने-अपने दाँव का मंचन : रिश्तों की खोखली बुनियाद को उजागर किया। तमाम संवेदनाओं को लाँघ कर रिश्तों पर हावी होते स्वार्थ और भौतिकवाद को नाटक अपने-अपने दाँव ने उखाड़ कर रख दिया।...पैसे से बदलते ख़ून के रिश्ते की धार को बख़ूबी मंच पर देख दर्शकों के समक्ष सामाजिक विसंगति के विविध पक्ष उजागर हुए। —अमर उजाला, मेरठपैसे के पीछे भागने वालों की दुर्दशा का मनोरंजक व व्यंगात्मक चित्रण है नाटक अपने-अपने दाँव में। सपना हुआ धराशाई जब सूटकेस में निकला जूता।... नाटक स्वार्थ के सामने खोखले पड़ते रिश्तों की मनोवैज्ञानिक पड़ताल है। —जागरण, नोएडा दकरते रिश्तों की कथा है अपने-अपने दाँव।... ‘अपने-अपने दाँव’ हँसते-हँसते लोभ की प्रवृत्ति पर चोट करने में सफल है।—हिन्दुस्तान, लखनऊअपने-अपने दाँव की प्रस्तुति के दौरान दर्शक लगभग दो घंटे तक हँसते ही रहे। एक हास्य नाटक की सफलता का इसके अतिरिक्त और क्या मापदण्ड हो सकता है।... रोचकता तथा सूक्ष्म अभिनय ने मिला कर नाटक को एक ऐसी सुखद अनुभूति प्रदान की, जो बहुत दिनों तक याद रहेगी।—जनयुग, दिल्ली

दया प्रकाश सिन्हाहिन्दी के लब्धप्रतिष्ठ नाटककार दया प्रकाश सिन्हा की रंगमंच के प्रति बहुआयामी प्रतिबद्धता है। पिछले चालीस वर्षों में अभिनेता, नाटककार, निर्देशक, नाट्य-अध्येता के रूप में भारतीय रंगविधा को उन्होंने विशिष्ट योगदान दिया है।दया प्रकाश सिन्हा के नाटकों की विशेषता है कि वे सदा बड़ी सफलता से मंच पर अभिनीत होते हैं। इसके कारण हैं- श्री सिन्हा का रंगमंच से निरन्तर जीवन्त सम्बन्ध तथा प्रकाशन के पूर्व अपने नाटकों की स्वयं प्रस्तुति करके उन्हें मंच-सिद्ध करना।प्रकाशित नाटक : मन के भँवर, इतिहास-चक्र, ओह अमेरिका, मेरे भाई : मेरे दोस्त, कथा एक कंस की, सादर आपका, सीढ़ियाँ, अपने-अपने दाँव, साँझ-सवेरा, पंचतंत्र लघुनाटक (बाल-नाटक), हास्य एकांकी (संग्रह) तथा इतिहास।नाटक-लेखन के लिए दया प्रकाश सिन्हा उत्तर प्रदेश संगीत नाटक अकादमी के ‘अकादमी पुरस्कार’, हिन्दी अकादमी, दिल्ली द्वारा 'साहित्य सम्मान' तथा उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान के ‘साहित्य भूषण' एवं 'लोहिया सम्मान' तथा केन्द्रीय संगीत नाटक अकादमी, नयी दिल्ली के राष्ट्रीय 'अकादमी सम्मान' से विभूषित हो चुके हैं।नाट्य लेखन के अतिरिक्त दया प्रकाश सिन्हा की रुचि लोक कला, ललित कला, पुरातत्त्व, इतिहास और समसामयिक राजनीति में भी है। वह आई.ए.एस. से अवकाश-प्राप्ति के पश्चात् स्वतन्त्र लेखन और रंगमंच से सम्बद्ध हैं।समय-विशेष से प्रेरित नाटक को सर्वकालिक आयाम देना ही उनके नाटकों को उत्कृष्ट साहित्यगत मूल्यों से विभूषित करता है।

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