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Kakkaji Kahin

by Manohar Shyam Joshi
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Book cover type: Hardcover
  • ISBN13: 9788181436702
  • Binding: Hardcover
  • Subject: N/A
  • Publisher: Vani Prakashan
  • Publisher Imprint: Vani Prakashan
  • Publication Date:
  • Pages: 176
  • Original Price: INR 395.0
  • Language: Hindi
  • Edition: 3rd Edition
  • Item Weight: 300 grams
  • BISAC Subject(s): General

अगर लोगों से पूछा जाए कि दूरदर्शन से प्रसारित सत्ता- प्रतिष्ठान पर सबसे करारी चोटें करने वाला कौन-सा सीरियल था तो वे बेहिचक जवाब देंगे- 'कक्काजी कहिन' । दर्शकों के लिए इसका प्रसारण जितने सुखद आश्चर्य का विषय था, उतने ही दुखद आश्चर्य का विषय था दफ़्तरशाहों और नेताओं के लिए। यों यह भी सच है. कि एक दुस्साहसिक दफ्तरशाह, तत्कालीन सूचना- प्रसारण सचिव एस. एस. गिल ने ही जोशी जी से बी. बी. सी. के 'येस मिनिस्टर' जैसी कोई चीज लिखने को कहा था। लेकिन उनके सेवा-निवृत्त होते ही यह कहा गया कि 'येस मिनिस्टर' जैसी चीज दूरदर्शन नहीं दिखा सकता। तो जोशी जी ने धारावाहिक दुबारा लिखा और मुख्य भूमिका से मंत्री जी को हटाकर अपने पुराने व्यंग्य स्तम्भ से नेता जी को बैठा दिया।इस धारावाहिक के प्रसारण में तरह-तरह के अड़ंगे लगाए गए। पहले उसे बनाने ही नहीं दिया गया। बनाने की अनुमति दी तो दो पायलट नामंजूर कर दिए गए और आखिर में धारावाहिक का प्रसारण हुआ भी तो 'नेता जी' को 'कक्का जी' बनवा कर और हर एपीसोड में से कुछ अंश कटवा कर और कुछ संवादों की बोलती बन्द करवा कर। इसके बावजूद सत्तावान बिरादरी ने इस धारावाहिक का यह कहकर विरोध किया कि देश के नेताओं को बदनाम किया जा रहा है तो दफ्तरशाहों ने तेरहवें एपीसोड पर ही धारावाहिक की तेरहवीं करवा दी।'कक्काजी कहिन' लेखक के 'नेताजी कहिन' से प्रेरित है और दोनों का चलनायक गोया चालू नायक भी एक ही है लेकिन 'कक्काजी कहिन' और 'नेताजी कहिन' की शैली और सामग्री दोनों ही बिल्कुल अलग हैं। इसलिए ही नहीं कि टेली-नाटक की विधा व्यंग्य स्तम्भ लेखन की विधा से अलग होती है बल्कि इसलिए भी कि- 'कक्काजी कहिन' में अनेक ऐसे प्रसंग और पात्र हैं जो 'नेताजी कहिन' में नहीं थे और 'नेताजी कहिन' के कई ऐसे प्रसंग और पात्र हैं जो 'कक्काजी कहिन' में रखे नहीं जा सके या रखने नहीं दिए गए। सेंसर का तो यह हाल था कि नेताजी का, क्षमा कीजिए कक्का जी का, ओठों के आगे अँगुलियाँ लगाकर पीक की पिचकारी छोड़ना भी धारावाहिक में दिखाया नहीं जा सका।व्यंग्य लेखन के लिए 'अट्टहास शिखर सम्मान', 'चकल्लस पुरस्कार' और 'शरद जोशी सम्मान' से विभूषित मनोहर श्याम जोशी की इस व्यंग्य-कृति को पढ़कर आपको अवश्य आनन्द आएगा।

मनोहर श्याम जोशी9 अगस्त, 1933 को अजमेर में जन्मे, लखनऊ विश्वविद्यालय के विज्ञान स्नातक मनोहर श्याम जोशी 'कल के वैज्ञानिक' की उपाधि पाने के बावजूद रोज़ी-रोटी की ख़ातिर छात्र जीवन से ही लेखक और पत्रकार बन गये। अमृतलाल नागर और अज्ञेय इन दो आचार्यों का आशीर्वाद उन्हें प्राप्त हुआ। स्कूल मास्टरी, क्लर्की और बेरोज़गारी के अनुभव बटोरने के बाद अपने 21वें वर्ष से वह पूरी तरह मसिजीवी बन गये।प्रेस, रेडियो, टी.वी., वृत्तचित्र, फिल्म, विज्ञापन- सम्प्रेषण का ऐसा कोई माध्यम नहीं जिसके लिए उन्होंने सफलतापूर्वक लेखन - कार्य न किया हो । खेल-कूद से लेकर दर्शनशास्त्र तक ऐसा कोई विषय नहीं जिस पर उन्होंने कलम न उठाई हो। आलसीपन और आत्मसंशय उन्हें रचनाएँ पूरी कर डालने और छपवाने से हमेशा रोकता चला आया। पहली कहानी तब छपी थी जब वह अठारह वर्ष के थे लेकिन पहली बड़ी साहित्यिक कृति प्रकाशित करवाई जब सैंतालीस वर्ष के होने आये। केन्द्रीय सूचना सेवा और टाइम्स ऑफ इंडिया समूह से होते हुए सन् 1967 में हिन्दुस्तान टाइम्स प्रकाशन में साप्ताहिक हिन्दुस्तान के सम्पादक बने और वहीं एक अंग्रेज़ी साप्ताहिक का भी सम्पादन किया। टेलीविजन धारावाहिक 'हम लोग' लिखने के लिए सन् 1984 में सम्पादक की कुर्सी छोड़ दी और तब से स्वतन्त्र लेखन करते रहे। 30 मार्च, 2006 को निधन ।

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