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Tirchee Rekhayen

by Harishankar Parsai
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Book cover type: Hardcover
  • ISBN13: 9788170554509
  • Binding: Hardcover
  • Subject: N/A
  • Publisher: Vani Prakashan
  • Publisher Imprint: Vani Prakashan
  • Publication Date:
  • Pages: 116
  • Original Price: INR 250.0
  • Language: Hindi
  • Edition: 2nd Edition
  • Item Weight: 250 grams
  • BISAC Subject(s): General

तिरछी रेखाएँ - ...परसाई जी की रचनाएँ राजनीति, साहित्य, भ्रष्टाचार, आज़ादी के बाद का ढोंग, आज के जीवन का अन्तर्विरोध, पाखण्ड और विसंगतियों को हमारे सामने इस तरह खोलती हैं जैसे कोई सर्जन चाकू से शरीर काट-काट कर गले अंग आपके सामने प्रस्तुत करता है। उनका व्यंग्य मात्र हँसाता नहीं है, वरन् तिलमिलाता है और सोचने को बरबस बाध्य कर देता है। कबीर जैसी उनकी अवधूत और निःसंग शैली उनकी एक विशिष्ट उपलब्धि है और उसी के द्वारा उनका जीवन चिन्तन मुखर हुआ है। उनके जैसा मानवीय संवेदना में डूबा हुआ कलाकार रोज़ पैदा नहीं होता। ... आज़ादी के पहले का हिन्दुस्तान जानने के लिए जैसे सिर्फ़ प्रेमचन्द पढ़ना ही काफ़ी है, उसी तरह आज़ादी के बाद भारत का पूरा दस्तावेज़ परसाई की रचनाओं में सुरक्षित है। चश्मा लगाकर 'रामचंद्रिका' पढ़ाने वाले पेशेवर हिन्दी के ठेकेदारों के बावजूद, परसाई का स्थान हिन्दी में हमेशा-हमेशा के लिए सुरक्षित है।- रवीन्द्रनाथ त्यागी

हरिशंकर परसाई - जन्म: 22 अगस्त, 1924 ई. ।शिक्षा : नागपुर विश्वविद्यालय से हिन्दी में एम. ए. । हिन्दी के मूर्धन्य और प्रखर व्यंग्यकार ।प्रकाशित पुस्तकें : 'हँसते हैं रोते हैं’, ‘तब की बात', 'सदाचार का ताबीज़', 'जैसे उनके दिन फिरे' (कहानी-संग्रह); 'रानी नागफनी की कहानी', 'तट की खोज', 'ज्वाला और जल (लघु उपन्यास); 'भूत के पाँव पीछे', 'बेईमानी की परत', 'पगडंडियों का ज़माना', 'शिकायत मुझे भी है’, ‘और अन्त में', ‘अपनी-अपनी बीमारी', 'ठिठुरता हुआ गणतंत्र' (व्यंग्य निबन्ध संग्रह), 'श्रेष्ठ व्यंग्य कथाएँ' और परसाई जी के विशिष्ट लेखन का यह महत्त्वपूर्ण दस्तावेज़ 'तिरछी रेखाएँ'।

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