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Surangama

by Shivani
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Book cover type: Paperback
  • ISBN13: 9788183610681
  • Binding: Paperback
  • Subject: N/A
  • Publisher: Rajkamal Prakashan
  • Publisher Imprint: Rajkamal Prakashan
  • Publication Date:
  • Pages: 195
  • Original Price: INR 299.0
  • Language: Hindi
  • Edition: 11th Edition
  • Item Weight: 25 grams
  • BISAC Subject(s): Ancient & Classical

“छोट्टो घर खानी

मौने की पौड़े सुरंगमा?

मौने की पौड़े, मौने की पौड़े?...”

एक प्राणों से प्रिय व्यक्ति तीन-चार मधुर पंक्तियों से सुरंगमा के जीवन को संझा के वेग से हिलाकर रख देता है। बार-बार।

शराबी, उन्मादी पति से छूटभागी लक्ष्मी को जीवनदाता मिला अँधेरे भरे रेलवे स्टेशन में। रॉबर्ट और वैरोनिका के स्नेहसिक्त स्पर्श में पनपने लगी थी उसकी नवजात बेटी सुरंगमा, लेकिन तभी विधि के विधान ने दुर्भाग्य का भूकम्पी झटका दिया और उस मलबे से निकली सरल निर्दोष पाँच साल की सुरंगमा कुछ ही महीनों में संसारी पुरखिन बन गई थी, फिर शिक्षिका सुरंगमा के जीवन में अंधड़ की तरह घुसता है, एक राजनेता और सुरंगमा उसकी प्रतिरक्षिता बन बैठती है।

क्या वह इस मोहपाश को तोड़कर इस दोहरे जीवन से छूट पाएगी?

मौने की पौड़े सुरंगमा?

एक एकाकी युवती की आन्तरिक और बाहरी संघर्षों की मार्मिक कथा।

गौरा पंत ‘शिवानी’ का जन्म 17 अक्टूबर 1923 को विजयादशमी के दिन राजकोट (गुजरात) में हुआ । आधुनिक अग्रगामी विचारों के समर्थक पिता श्री अश्विनीकुमार पाण्डे राजकोट स्थित राजकुमार कॉलेज के प्रिंसिपल थे, जो कालांतर में माणबदर और रामपुर की रियासतों में दीवान भी रहे । माता और पिता दोनों ही विद्वान, संगीतप्रेमी और कई भाषाओं के ज्ञाता थे । साहित्य और संगीत के प्रति एक गहरी रुझान ‘शिवानी’ को उनसे ही मिली । शिवानी जी के पितामह संस्कृत के प्रकांड विद्वान पं– हरिराम पाण्डे, जो बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में धर्मोपदेशक थे, परम्परानिष्ठ और कट्टर सनातनी थे । महामना मदनमोहन मालवीय से उनकी गहन मैत्री थी । वे प्राय अल्मोड़ा तथा बनारस में रहते थे, अत: अपनी बड़ी बहन तथा भाई के साथ शिवानी जी का बचपन भी दादाजी की छत्रछाया में उक्त स्थानों पर बीता । उनकी किशोरावस्था शान्तिनिकेतन में, और युवावस्था अपने शिक्षाविद् पति के साथ उत्तर प्रदेश के विभिन्न भागों में । पति के असामयिक निधन के बाद वे लम्बे समय तक लखनऊ में रहीं और अन्तिम समय में दिल्ली में अपनी बेटियों तथा अमरीका में बसे पुत्र के परिवार के बीच अधिक समय बिताया । उनके लेखन तथा व्यक्तित्व में उदारवादिता और परम्परानिष्ठता का जो अद्भुत मेल है, उसकी जड़ें इसी विविधमयतापूर्ण जीवन में थीं ।

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