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Pratinidhi Kahaniyan : Zilani Bano

by Zilani Bano
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Book cover type: Paperback
  • ISBN13: 9789388183857
  • Binding: Paperback
  • Subject: N/A
  • Publisher: Rajkamal Prakashan
  • Publisher Imprint: Rajkamal Prakashan
  • Publication Date:
  • Pages: 164
  • Original Price: INR 199.0
  • Language: Hindi
  • Edition: 2nd Edition
  • Item Weight: 116 grams
  • BISAC Subject(s): Short Stories (single author)

जीलानी बानो उर्दू की ऐसी कथाकार हैं जिन्होंने पर्दे में रहते हुए भी अपने जमाने की अदबी चहल -पहल की आहटें सुनकर लिखना आरंभ किया । यह वो जमाना था जब हैदराबाद में पुलिस कार्रवाई के नतीजे में आसिफजादी पीढ़ी के आखिरी नवाब मीर उस्मान अली खाँ को अपनी दस्तार में 'राज -प्रमुख' की कलगी लगाने पर मज़बूर होना पड़ा था । यह नई और पुरानी कद्रों और सभ्यता के आकारों में टूट -फूट का जमाना था । जिंदगी बसर करने का एक खास ढाँचा था । सुबह व शाम अपने रूटीन थे । बड़े, छोटे- अहम और गैर - अहम, आका और गुलाम, कनीज और रखैल ये सारे झूठे -सच्चे रिशते थे जिनके बीच लाड बाजार की चूड़ियाँ, ज़र्क -बर्क लिबास, शेरवानी, तुर्की टोपी, चिलमन बजूर्दार शिकरा में, सिनेमाघर, दावतें, .शादी -ब्याह, और 'शेरो -.शायरी सब अपनी खास सज - धज के सा थ कहानीकार से हाथ मिलाते रहते थे । जीलानी बानो ने हैदराबाद की इस टूट-फूट को बड़े करीब से देखा है जो हैदराबादी दीवानखानों के बजाय जनानखानों में जिंदगी के दुख - सुख को नई-नई सूरतें दे रही थीं । एक कथाकार: के तौर पर जीलानी बानो का विजन बेहद ताकतवर है । वह जिंदगी में बहुत दूर तक पैठता है । जिंन्दगी के पाताल में उतरकर उसके ओर-छोर की खोज कहानी के मा ध्यम से कम ही कहानीकारों ने की होगी । जीलानी बानो का लहजा संभला हुआ, गंभीर और सोचता हु आ है । वहु अपनी कहानी में जायके की खातिर वह सव कुछ नहीं मिलातीं जिससे कहानी की खूब चर्चा' हो और वह पसंद की जाए । जीलानी बानो ने अपनी कहानियों में एक असलूब तराशा है जो उसके लंबे रचनात्मक सफर की देन है । वह यकीनन हमारे दौर के उर्दू कथा-साहित्य की अगली सफ में बैठी हुई कहानीकार हैं ।

जन्म: 1936। जन्मस्थान: बदायूँ (उ.प्र.)। शिक्षा: एम.ए. (उर्दू)। इनकी कहानियों और उपन्यासों से आज के समय के बदलते जीवन-मूल्यों और समाज में औरत की हैसियत का एहसास होता है। जीलानी बानो अपनी धरती और दुनिया को ही अपनी कहानियों का मज़मून बनाती हैं। हैदराबाद की तहज़ीबी ज़िन्दगी पर उनका पहला उर्दू उपन्यास ऐवान-ए-ग़ज़ल काफ़ी चर्चित हुआ। अब तक हिन्दी और गुजराती में इसका अनुवाद हो चुका है। नेशनल बुक ट्रस्ट की योजना इसे हिन्दुस्तान की चौदह भाषाओं में प्रकाशित करने की है। इनके एक अन्य उपन्यास का नाम है - बारिश-ए-संग। इसका हिन्दी अनुवाद पत्थरों की बारिश नाम से छपा। इसके अतिरिक्त नौ कहानी-संग्रह प्रकाशित। इनकी कई कहानियों का अनुवाद विभिन्न देशी और विदेशी भाषाओं में हो चुका है। इन्होंने रेडियो और टी.वी. के लिए कई नाटक लिखे। पुरस्कार: ग़ालिब एवार्ड (1978), सोवियत लैण्ड नेहरू एवार्ड (1985), महाराष्ट्र उर्दू एकेडमी एवार्ड (1988), हरियाणा उर्दू एकेडमी एवार्ड (1989), पाकिस्तान का नुकुश एवार्ड (1991)। इनके अतिरिक्त कई अन्य पुरस्कार।

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