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Aadividrohi Tilka Manjhi

by Ghanshyam
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Book cover type: Hardcover
  • ISBN13: 9789362876430
  • Binding: Hardcover
  • Subject: N/A
  • Publisher: Vani Prakashan
  • Publisher Imprint: Vani Prakashan
  • Publication Date:
  • Pages: 100
  • Original Price: INR 299.0
  • Language: Hindi
  • Edition: N/A
  • Item Weight: 300 grams
  • BISAC Subject(s): General

तिलका माँझी एक ऐतिहासिक पात्र है। ऐतिहासिक पात्रों को जब कथा का विषय बनाया जाता है, तब लेखक के हाथ-पाँव काफी बँधे होते हैं। साक्ष्य के अभाव में उन्हें कई प्रकार की कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। तिलका माँझी की कथा की रचना-प्रक्रिया के सम्बन्ध में लेखक ने अपनी इस लाचारी का बयान किया है, “मशहूर लेखिका महाश्वेता देवी ने तिलका बाबा को सन्थाल समुदाय का बतलाया है। जबकि अधिकांश लेखकों ने तिलका बाबा को ज़बरा पहाड़िया के रूप में चिह्नित किया है। ...दस्तावेज़ के अभाव में एक लेखक कितना लाचार हो जाता है—यह तिलका बाबा की कथा ने साबित कर दिया।"लेखक के अनुसार, “तिलका बाबा राजमहल की पहाड़ियों के बीच बसे तिलकपुर गाँव के रहने वाले थे। उनका नाम ज़बरा पहाड़िया था । ज़बरा पहाड़िया की आँखें बड़ी-बड़ी थीं। इस तरह की आँख वाले को पहाड़िया भाषा में तिलका कहा जाता है, सो ज़बरा पहाड़िया को घर-घर में तिलका कहकर पुकारा जाने लगा। ...दस्तावेज़ों में तिलका शब्द नहीं मिलता, लेकिन ज़बरा पहाड़िया शब्द मिलता है। यह आज भी विवाद का विषय बना हुआ है कि तिलका बाबा सन्थाल थे या पहाड़िया। कुछ लोग अभी भी तिलका माँझी को सन्थाल मानते हैं।”★★★तिलका माँझी क्लीवलैंड को आदिवासियों की शक्ति का एहसास कराना चाहते थे क्लीवलैंड आहत हो गया और इंग्लैंड ले जाने थे, लेकिन ना चाहते हुए भी युद्ध के क्रम में जहाज़ पर ही उनकी मृत्यु हो गयी।क्लीवलैंड के बाद आयरकूट ने कमान सँभाली। आयरकूट और जाऊरा की अगुवाई में 1200 हिल रेंजर्स और सौ बन्दूकधारी निकल पड़े।दूसरी ओर तिलका बाबा की तैयारी भी पक्की थी। “तिलका बाबा का रौद्र रूप देख सभी हतप्रभ थे। उन्होंने कुल्हाड़ी अपनी कमर में कसी। तीर के तूणीर को दाहिने कन्धे पर लटकाया और धनुष को बायें कन्धे पर सहेज निकल पड़ा यह रणबांकुरा। ...तीतापानी की पहाड़ियों पर चारों तरफ़ से हूल, हूल, हूल के नारे गूँजने लगे। इस गगनचुम्बी आवाज़ को सुनकर आँखें मलते हुए आयरकूट उठा ही था कि सनसनाते हुए एक पत्थर ने कहा, 'स्वागत है आयरकूट !' ठीक इसी बीच एक तीर उसकी बायीं बाँह में समा गया।”यह एक निर्णायक युद्ध साबित हुआ। ज़ख़्मी हालत में तिलका बाबा पकड़ लिए गये। उन्हें चार घोड़ों के बीच रस्से से बाँध घसीटा जाने लगा। घोड़े जब रुकते तब बाबा थोड़ी गम्भीर साँस लेते। एक तो वे घायल थे। उनकी जाँघ में तीर लगा था, जाँघ बुरी तरह लहूलुहान थी। दूसरे घसीटे जाने के कारण पूरा शरीर क्षत-विक्षत था। घोड़े के रुकते ही बाबा सिंगबोंगा को निहारते। मन ही मन बुदबुदाते। मानो मन ही मन सिंगबोंगा से कह रहे हों कि मैंने तो तुम्हारी धरोहरों की रक्षा में कोई कोताही नहीं की। मैंने एक ऐसी पीढ़ी तैयार कर दी है जो फिरंगियों को चैन की नींद सोने नहीं देगी। इसलिए, अब कोई मलाल नहीं कि मैं रहूँ या न रहूँ। नयी पीढ़ी इस हूल को आगे ले जायेंगी।- इसी पुस्तक से

घनश्याम का जन्म महुआडाबर (प्रखण्ड-मधुपुर, ज़िला-देवघर, झारखण्ड) नामक एक आदिवासी बहुल गाँव में हुआ। प्रारम्भिक शिक्षा-दीक्षा गाँव के ही विद्यालय में हुई। आगे की पढ़ाई एडवर्ड जार्ज हाई स्कूल, मधुपुर तथा राँची विश्वविद्यालय में हुई। इसी दौरान लोकनायक जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में हुए सम्पूर्ण क्रान्ति आन्दोलन में अपनी सक्रिय भूमिका निभाई। आन्दोलन के दौरान इन्हें 'मीसा' और 'डीआइआर' में नज़रबन्द कर भागलपुर केन्द्रीय कारा तथा भागलपुर कैम्प जेल में रखा गया। आपातकाल की समाप्ति के बाद झारखण्ड के आदिवासी इलाक़ों में जल, जंगल, ज़मीन और आदिवासी अस्मिता को बचाने के लिए संघर्षरत रहे तथा युवाओं को शिक्षित-प्रशिक्षित करते रहे। बाबा आमटे ने इन्हें 'लोकनायक जयप्रकाश नारायण युवा अवार्ड' से नवाज़ा। इन्होंने आदिवासियों के बीच काम करते हुए इंडिजिनोक्रेसी (देशज गणतन्त्र) नामक चर्चित पुस्तक का लेखन किया । इसका एक आलेख ‘पेंग्विन’ ने अपनी पुस्तक 'बीइंग आदिवासी' में समायोजित किया। ‘सभ्यता का संकट बनाम आदिवासियत ग्यारहवीं और हुलगुलान के शहीद आदिविद्रोही तिलका माँझी’ घनश्याम की बारहवीं पुस्तक है।

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