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Andhere Ka Tala

by Mamta Kalia
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Book cover type: Paperback
  • ISBN13: 9788181439994
  • Binding: Paperback
  • Subject: N/A
  • Publisher: Vani Prakashan
  • Publisher Imprint: Vani Prakashan
  • Publication Date:
  • Pages: 112
  • Original Price: INR 75.0
  • Language: Hindi
  • Edition: 2nd Edition
  • Item Weight: 150 grams
  • BISAC Subject(s): Comics & Graphic Novels

ममता कालिया की रचनाओं में जिस संवेदनशील, सन्तुलित, समझदार लेकिन चुलबुले, मानवीय सहानुभूति से आलोकित व्यक्तित्व की झलक मिलती है, वह उनके दृष्टिकोण की मौलिकता से दुगुना दम पाती है। उनकी रचनाओं में कलावादी कसीदाकारी न हो कर रोजमर्रा के जीवन के यथार्थ का सौन्दर्यबोध है। ममता कालिया ने लगभग हर रचना में अपने समय और समाज को पुनर्परिभाषित करने का सृजनात्मक जोखिम उठाया है। कभी वे समूचे परिवेश में नया सरोकार ढूँढती हैं तो कभी वे वर्तमान परिवेश में नयी अस्मिता और संघर्ष को शब्द देती हैं।'अँधेरे का ताला' में ममता ने अपने चिरपरिचित परिवेश - कॉलेज की अध्यापिकाओं, छात्राओं और अन्य कर्मचारियों के जीवन - को चित्रित किया है। निराला की प्रसिद्ध कविता की पंक्तियों को सामने रखते हुए ममता ने 'अँधेरे का ताला खोलने वालों' की असलियत को अपने सुपरिचित व्यंग्य-विनोद भरी शैली में उकेरा है। शिक्षा का क्षेत्र किस तरह की उथल-पुथल का शिकार है, इसका एक दस्तावेज़ी चित्रण ममता ने इस उपन्यास में किया है और अन्त में नन्दिता और उसकी छात्राओं की हिम्मत पाठक को एक अदम्य साहस से भर जाती है। उपन्यास की ख़ूबी यह है कि ममता ने कहीं भी उपदेश देने की कोशिश नहीं की, बल्कि इस 'अँधेरे' के अक्स खींचते हुए 'उजाले' के द्वीपों पर भी नज़र डाली है।स्वातन्त्र्योत्तर भारत के शिक्षित, संघर्षरत और परिवर्तनशील समाज का सजीव चित्र इस उपन्यास में अपने बहुरंगी आयामों में दिखायी देता है। हिन्दी कथा-जगत में ममता कालिया की तरह लिखने वाले रचनाकार विरल हैं जो गहरी आत्मीयता, आवेग और उन्मेष के साथ जीवन के धड़कते क्षण पाठक तक पहुँचा सकें। इनके लेखन में अनुभूति की ऊष्मा अनुभव की ऊर्जा के साथ रची-बसी है।

ममता कालिया कई शहरों में रहने, पढ़ने और पढ़ाने के बाद अब ममता कालिया दिल्ली (एनसीआर) में रहकर अध्ययन और लेखन करती हैं। वे हिन्दी और इंग्लिश दोनों भाषाओं की रचनाकार हैं। भारतीय समाज की विशेषताओं और विषमताओं पर अपनी पैनी नज़र रखते हुए ममता कालिया की प्रत्येक रचना के केन्द्र में आज का समाज है।विकासशील समाज में बनते-बिगड़ते सम्बन्ध, प्रगति के आर्थिक, सामाजिक दबाव, स्त्राी की प्रगति को देखकर पुरुष मनोविज्ञान की कुण्ठाएँ और कामकाजी स्त्राी के संघर्ष उनके प्रिय विषय हैं। प्रकाशित पुस्तकों की संख्या विपुल होने के कारण यहाँ केवल उनकी प्रमुख प्रकाशित पुस्तकों का उल्लेख किया जा रहा है। ममता कालिया ने कविता, कहानी, उपन्यास, संस्मरण, नाटक, यात्रा- साहित्य और निबन्धों से हिन्दी साहित्य को समृद्ध किया है ।प्रमुख उपन्यास : बेघर, नरक दर नरक, तीन लघु उपन्यास, दौड़, दुक्खम-सुक्खम, सपनों की होम डिलिवरी, कल्चर-वल्चर। प्रमुख कहानी संग्रह : छुटकारा, सीट नम्बर छह, उसका यौवन, एक अदद औरत, जाँच अभी जारी है, निर्मोही, मुखौटा, बोलने वाली औरत, थोड़ा सा प्रगतिशील, ख़ुशक़िस्मत। कविता संग्रह : । A Tribute to Papa and Other Poems (Writers Workshop), Poems 78 (Writers Workshop), खाँटी घरेलू औरत, पचास कविताएँं, कितने प्रश्न करूँ। संस्मरण : कल परसों के बरसों, कितने शहरों में कितनी बार। निबन्ध् संग्रह : भविष्य का स्त्राी विमर्श, स्त्राी विमर्श का यथार्थ।ममता कालिया ने अनेक कहानी संकलनों का सम्पादन किया है तथा 5 वर्ष महात्मा गाँधी हिन्दी अन्तरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय, वर्धा की इंग्लिश पत्रिका भ्पदकप की सम्पादक रही हैं। उन्हें मिले पुरस्कारों और सम्मानों की सूची में कुछ इस प्रकार हैं: सर्वश्रेष्ठ कहानी सम्मान हिन्दुस्तान टाइम्स, दिल्ली; यशपाल कथा सम्मान, साहित्य भूषण सम्मान, राम मनोहर लोहिया सम्मान (उ.प्र. हिन्दी संस्थान द्वारा); वनमाली सम्मान, वाग्देवि सम्मान, सीता स्मृति सम्मान, कमलेश्वर स्मृति सम्मान, के. के. बिड़ला न्यास का व्यास सम्मान।सम्प्रति वे एक उपन्यास और संस्मरणमाला पर कार्य कर रही हैं।

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