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Ashok Rajpath

by Avadhesh Preet
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Book cover type: Paperback
  • ISBN13: 9789387462168
  • Binding: Paperback
  • Subject: N/A
  • Publisher: Rajkamal Prakashan
  • Publisher Imprint: Rajkamal Prakashan
  • Publication Date:
  • Pages: 230
  • Original Price: INR 225.0
  • Language: Hindi
  • Edition: N/A
  • Item Weight: 230 grams
  • BISAC Subject(s): General

महत्त्वपूर्ण कथाकार अवधेश प्रीत का यह उपन्यास बिहार के कॉलेज और विश्वविद्यालय के शिक्षण-परिवेश को उजागर करता है कि किस तरह प्राध्यापक अपनी अतिरिक्त आय के लिए कोचिंग का व्यवसाय कर रहे हैं। इसके पार्श्व में छात्र-राजनीति का भी खुलासा होता है—छात्रों की उच्छृंखलता, अनुशासनहीनता और भ्रष्टता से उपजे सवाल पाठक के अन्तर्मन में लगातार विचलन भरते हैं। गाँवों, क़स्बों से अपना भविष्य सँवारने आए छात्र विद्या और अनीता जैसी लड़कियों के रोमांस में उलझकर वायावी वैचारिकता की बहसें ही नहीं करते, अपितु शराब और आवारगी में अपने को पूरी तरह झोंक देते हैं। वे कोचिंग के विरोध में आन्दोलन करते हैं, जिससे अशोक राजपथ का जनजीवन अस्त-व्यस्त और दुकानें बन्द हो जाती हैं, पुलिस प्रशासन इस विरोध की समाप्ति में अ-सक्षम सिद्ध होता है। और एक खिसियाहट हवा में तारी हो जाती है।

दिवाकर, राजकिशोर, जीवकान्त जैसे किरदार अपने कार्य-कलापों से अन्त तक कौतुक, आशंकाएँ और रोमांच के भावों-विभावों का सृजन करते हैं। कमलेश की मृत्यु को छात्र शहीद की सरणि में दर्ज कराते हैं जो कि परिस्थितिजन्य बेचारगी है। उपन्यास में जिज्ञासा के समानान्तर एक सहम महसूस होती रहती है—यहाँ प्रतिवाद का परिणाम अज्ञात नहीं रहता। वहीं अंशुमान की उदास आँखों में अपने आदर्श को बचाने की बेचैनी गहरे तक झकझोर जाती है। सड़कों पर जीवन की हलचल और भागमभाग है—जैसे सभी एक नए लोक की खोज में हों, यानी वे सभी अशोक राजपथ से पीछा छुड़ाने की हड़बड़ी में हों। अन्तत: जीवकान्त स्वयं से प्रश्न करता है—हमें किधर जाना है?

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