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Bagair Tarashe Huye

by Sudha Arora
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Book cover type: Paperback
  • ISBN13: 9789377471620
  • Binding: Paperback
  • Subject: N/A
  • Publisher: Lokbharti Prakashan
  • Publisher Imprint: Lokbharti Prakashan
  • Publication Date:
  • Pages: 184
  • Original Price: INR 250.0
  • Language: Hindi
  • Edition: N/A
  • Item Weight: 194 grams
  • BISAC Subject(s): N/A

‘बग़ैर तराशे हुए’ सुधा अरोड़ा का पहला कहानी-संग्रह है, आज जिसकी हैसियत एक दस्तावेज़ की है, और लगभग इसी रूप में इस नए संस्करण को प्रस्तुत भी किया जा रहा है।

वर्ष 1968 में जब यह संग्रह पहली बार प्रका‌‌शित हुआ, उस समय बहुत कम स्त्री-कथाकार थीं, जो बड़े फलक पर स‌क्रिय थीं, लेकिन यही वह समय था जब देश का युवा स्त्री-समाज शिक्षा के क्षेत्र में अपने शुरुआती क़दम बहुत उम्मीद के साथ रखने लगा था। इन कहानियों में इस बदलाव को आते हुए देखा जा सकता है, साथ ही साठ साल पहले का वह समय भी जब क़स्बों-शहरों और महानगरों की सड़कें, गलियाँ और चौराहे आज वाली रफ़्तार से नहीं, ठहराव, सुकून और लोगों की ऊष्म पारस्परिकता से पहचाने जाते थे। इतने लम्बे वक़्फ़े और बहुमुखी विकास, तथा अप-विकास के भी, इतने तीव्र झंझावातों के बाद इन कहानियों और इनमें निबद्ध समय से गुज़रना हमें एक तरह से कुछ ताज़ा-सा कर जाता है।

जो प्रश्न आज़ादी के साथ ही हमारी सामाजिकता और राजनीति के सामने आ खड़े हुए थे उनको भी ये कहानियाँ अपेक्षित ईमानदारी और साहस के साथ संबोधित करती हैं, मसलन साम्प्रदायिकता, भ्रष्टाचार और मनुष्य का धीरे-धीरे होता अमानवीकरण।

‘बग़ैर तराशे हुए’ के इस संस्करण में उस दौर की प्रमुख पत्रिकाओं, ‘समीक्षा’, ‘धर्मयुग’ और ‘आवेश’ में प्रकाशित इस संग्रह की समीक्षाओं से कुछ अंश भी शामिल किए गए हैं, जो इस प्रस्तुति को सम्पूर्ण अध्ययन में बदल देते हैं।

सुधा अरोड़ा

सातवें दशक की बहुचर्चित कथाकार सुधा अरोड़ा का जन्म 4 अक्टूबर, 1946 को लाहौर में हुआ। शिक्षा-दीक्षा कोलकाता में हुई। 1967 में हिन्दी साहित्य में एम.ए. किया। उनका पहला कहानी-संग्रह ‘बगैर तराशे हुए’ 1968 में प्रकाशित हुआ। 1993 में मुम्बई की ‘हेल्प’ संस्था से जुड़ने के बाद वे महिलाओं के मुद्दों और सामाजिक कार्यों के प्रति समर्पित रहीं।

अब तक उनके कई कहानी-संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं जिनमें ‘महानगर की मैथिली’, ‘काला शुक्रवार’, ‘रहोगी तुम वही’ और ‘एक औरत : तीन बटा चार’ चर्चित हैं। कविता-संग्रह तथा उपन्यास के अतिरिक्त वैचारिक लेखों की किताबें ‘आम औरत : ज़िंदा सवाल’, ‘एक औरत की नोटबुक’ और ‘साँकल, सपने और सवाल’ भी प्रकाशित हो चुकी हैं। उनकी सम्पादित पुस्तकों में ‘औरत की कहानी’, ‘दहलीज़ को लाँघते हुए’, ‘पंखों की उड़ान’, ‘मन्नू भंडारी : सृजन के शिखर’, ‘स्त्री संवेदना : विमर्श के निकष’ प्रमुख हैं। उनकी कहानियाँ भारतीय भाषाओं के अतिरिक्त अंग्रेजी, फ्रेंच, पोलिश, जर्मन, इतालवी, चेक, डच, जापानी और ताजिकी आदि में अनूदित हुई हैं। कई कहानियों पर मुम्बई, कोलकाता, लखनऊ दूरदर्शन तथा प्रसार भारती द्वारा लघु फिल्मों का निर्माण हुआ है। उन्होंने बड़े पैमाने पर सम्पादन और स्तम्भ-लेखन भी किया है। 1977-78 में पाक्षिक ‘सारिका’ में ‘आम औरत : ज़िंदा सवाल’, 1997-98 में दैनिक अखबार ‘जनसत्ता’ में साप्ताहिक स्तम्भ ‘वामा’, 2004-2009 तक ‘कथादेश’ में ‘औरत की दुनिया’ और 2013 से ‘राख में दबी चिनगारी’ स्तम्भ ने साहित्यिक परिदृश्य पर अपनी ख़ास जगह बनाई है।

उन्हें उ.प्र. हिन्दी संस्थान के पुरस्कार, ‘प्रियदर्शिनी पुरस्कार’, ‘महाराष्ट्र राज्य हिन्दी अकादमी सम्मान’, ‘केन्द्रीय हिन्दी निदेशालय पुरस्कार’, ‘मुंशी प्रेमचन्द कथा सम्मान’ समेत कई सम्मानों से सम्मानित किया गया है।

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