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Bhagwadgita-Kaavya

by Mulchand Pathak
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Book cover type: Hardcover
  • ISBN13: 9788177212396
  • Binding: Hardcover
  • Subject: N/A
  • Publisher: Prabhat Prakashan Pvt. Ltd.
  • Publisher Imprint: Prabhat Prakashan Pvt. Ltd.
  • Publication Date:
  • Pages: 160
  • Original Price: INR 200.0
  • Language: Hindi
  • Edition: N/A
  • Item Weight: 200 grams
  • BISAC Subject(s): Hinduism / General

भगवद्गीता भारत के आध्यात्मिक वाङ्मय की अनुपम विभूति है। यह कमसेकम दो सहस्र वर्षों से भी अधिक समय से भारतीय चिंतन व आध्यात्मिक साधना की महत्त्वपूर्ण प्रेरणास्रोत रही है। विश्व की सभी महत्त्वपूर्ण भाषाओं में गीता के अनुवाद किए जा चुके हैं। हिंदी भाषा भी इसका अपवाद नहीं है; किंतु ये अनुवाद प्राय : गद्य में किए गए हैं। अत : एक पद्यात्मक कृति के रूप में गीता के मूल पाठ में जो लयात्मक सरलता है, वह इन अनुवादों में सुलभ नहीं है। इसी अभाव की पूर्ति के लिए गीता का यह काव्यात्मक अनुवाद ‘भगवद्गीताकाव्य’ प्रस्तुत किया जा रहा है। गीता के मूल संस्कृत पाठ में अंत्यानुप्रास या तुकों की योजना का अभाव है। इसी बात को ध्यान में रखकर प्रस्तुत अनुवाद में छंद व लय का निर्वाह करते हुए भी तुकें मिलाने का प्रयास नहीं किया गया। इससे अनुवादक को गीता के मूल अर्थ की अधिकतम रक्षा में अभीष्ट सफलता मिली है। जीवन की विषमसेविषम परिस्थिति में गीता ने असंख्य लोगों को मानसिक शांति प्रदान कर उनके जीवनपथ को आलोकित किया है। आज के भौतिकतापरायण, मानसिक तनावों से ग्रस्त तथा जीवन के वास्तविक अर्थ की खोज में भटकते मनुष्य के लिए गीता का संदेश उतना ही प्रासंगिक है, जितना वह सदैव रहा है।आशा है, गीता का यह काव्यात्मक अनुवाद संस्कृत न जाननेवाले या उसका कम ज्ञान रखनेवाले गीताप्रेमियों को मूल संस्कृत पाठ को पढ़ने जैसा ही आनंद दे सकेगा।

जन्म : ६ अक्तूबर, १९३२ को जयपुर (राजस्थान) में।शिक्षा : एम.ए. (संस्कृत व हिंदी), पीएच.डी (संस्कृत)।प्रकाशन : ‘संस्कृत नाटक में अतिप्राकृत तत्त्व’ (शोधग्रंथ), ‘सिकता का स्वप्न’ (कवितासंग्रह), ‘राजरत्नाकार महाकाव्य’— हस्तलिखित प्रतियों के आधार पर संस्कृत मूलपाठ का संपादन एवं अनुवाद (राजस्थान पुरातन ग्रंथमाला में ग्रंथांक २०१ के रूप में प्रकाशित), ‘भगवद्गीताकाव्य’ (गीता का काव्यानुवाद), ‘भर्तृहरि का नीति शतक’, ‘भर्तृहरि का शृंगार शतक’, ‘भर्तृहरि का वैराग्य शतक’ (मुक्तछंदीय काव्यानुवाद), ‘रघुवंश महाकाव्य’ (काव्यानुवाद), ‘पर्यावरणशतकम्’ (संस्कृत काव्य), ‘ऋतुसंहार’, ‘कुमारसंभव’ (काव्यानुवाद), ‘जिंदगी की धूपछाँह’ (मौलिक हिंदी काव्य)।सम्मानपुरस्कार : मानव संसाधन विकास मंत्रालय, भारत सरकार तथा राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान, नई दिल्ली; राजस्थान सरकार तथा राजस्थान संस्कृत अकादमी, जयपुर द्वारा ‘विद्वत्सम्मान’ एवं जय साहित्य संसद् व अनुग्रह अकादमी, जयपुर द्वारा सम्मानित।संप्रति : सेवानिवृत्त प्रोफेसर एवं अध्यक्ष, संस्कृत विभाग तथा भूतपूर्व अधिष्ठता, कला महाविद्यालय, मानविकी संकाय व स्नातकोत्तर अध्ययन, मोहनलाल सुखाडि़या विश्वविद्यालय, उदयपुर (राजस्थान)।

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