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Chhuti Hui Cheezein

by Natasha
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Book cover type: Paperback
  • ISBN13: 9789377373863
  • Binding: Paperback
  • Subject: N/A
  • Publisher: Rajkamal Prakashan
  • Publisher Imprint: Rajkamal Prakashan
  • Publication Date:
  • Pages: 104
  • Original Price: INR 250.0
  • Language: Hindi
  • Edition: N/A
  • Item Weight: 110 grams
  • BISAC Subject(s): N/A

‘छूटी हुई चीज़ें’ में संकलित अधिकतर कविताएँ वास्तव में ही उन अनुभवों की ओर जाती हैं जो कई कवियों से अकसर ही छूट जाया करते हैं। एक नई क़लम के लिए यह निश्चय ही उल्लेखनीय उपलब्धि है। संग्रह के आरम्भिक पृष्ठों में ही मौजूद कविता ‘साथ-असाथ’ एक जाते हुए प्रेम और उसके पीछे छूटती ख़ाली जगहों को जिस कौशल से नितान्त चाक्षुष चित्रों में चिह्नित करती है, वह कवि की एकदम अपनी दृष्टि को रेखांकित करता है। ‘प्रेम के अवसान में’ और ‘आते रहना प्रेम’ शीर्षक कविताएँ पुनः इसकी पुष्टि करती हैं।

नताशा एक तरह से दुनिया को देखने के लिए अपनी एक अलग जगह बनाती हैं, जहाँ खड़ा होकर उनका कवि भाषा की परम्परा और संस्कार के बीच अपनी राह बनाता है, उसके लिए संघर्ष करता हुआ दिखता है।

मैं धरती के किसी हिस्से में/गुमशुदा पानी की बूँद-सा ज़रूरी होना चाहती हूँ/ मेरा पता सदैव/इन्हीं रेतीले रास्तों से होकर गुज़रा करे।

ये कविताएँ विरोध, असहमति और विद्रोह का भी अपना एक भिन्न स्वर रचती हैं जिससे एक व्यथा, एक अवसाद निरन्तर झाँकता रहता है।

एक कविता हमारे वर्तमान को इस तरह देखती है : हम राष्ट्र के सलज्ज नागरिक/जलते हुए देखेंगे देश को टीवी पर/एसी थोड़ा तेज़ करते हुए/...अगली सन्ततियों के लिए/एक ही सत्य बचेगा/कि धरती के नीचे कुछ नहीं/सिवाय मन्दिर मस्जिद के।

एक पूरी पीढ़ी है, देश का एक भिन्न रूप जिसकी स्मृति का हिस्सा है, वह देश जो राग की तरह बजता है। वह देश अब कुछ और हो रहा है। वह राग अब छीज रहा है। इस संग्रह की कविता ‘देश राग’ उसी क्षरण की पीड़ा से बनी है और अलग से ध्यान खींचती है।

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