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Dead End

by Padmesh Gupta
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Book cover type: Hardcover
  • ISBN13: 9789355189004
  • Binding: Hardcover
  • Subject: N/A
  • Publisher: Vani Prakashan
  • Publisher Imprint: Vani Prakashan
  • Publication Date:
  • Pages: 100
  • Original Price: INR 295.0
  • Language: Hindi
  • Edition: N/A
  • Item Weight: 300 grams
  • BISAC Subject(s): Short Stories (single author)

डेड एंड पद्मेश गुप्त की कहानियों का नवीनतम संग्रह है। मूल्यों के टकराव का सजीव चित्रण है पद्मेश गुप्त के लेखन में। 'तिरस्कार', 'डेड एंड', 'कब तक' मिली-जुली संस्कृति के टकराव को बखूबी चिह्नित करती हैं। पद्मश जी रफ़्तार से कहानी आगे बढ़ाते हैं और अन्त तक आकर पाठक को अपने कथा-संसार में शामिल कर लेते हैं।- ममता कालिया वरिष्ठ कथाकार★★★★★डॉ. पद्मेश गुप्त शिक्षा और भाषा-सेवा के क्षेत्र में एक जाना-पहचाना नाम है। भारत के बाहर रहकर जिन लोगों ने हिन्दी की सेवा की है, उनमें डॉ. पद्मेश गुप्त का नाम प्रमुख है। डॉ. गुप्त ने कवि और सम्पादक के रूप में प्रतिष्ठा अर्जित की है। डेड एंड उनका पहला कहानी-संग्रह है। डॉ. गुप्त की कहानियाँ उनके चार दशक के प्रवासी जीवन की अनुभूतियों को प्रतिबिम्बित करती हैं। इन कहानियों में प्रवासी जीवन को देखने की एक नयी दृष्टि है जो विषयों और घटनाओं के बहुरंगी वैविध्य का सुन्दर उदाहरण है। समाज, धर्म, राजनीति, संस्कृति से लेकर व्यक्तिगत सम्बन्ध तक अलग विषयों को छूती ये कहानियाँ पिछले वर्षों में अलग-अलग पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं जिन्हें पाठकों ने सराहा है। उन्हें एक संग्रह के रूप में लाकर समग्रता देने का काम वाणी प्रकाशन ने किया है। यह कहानी-संग्रह एक हिन्दी सेवी के रूप में डॉ. पद्मेश गुप्त की वैश्विक पहचान को और समृद्ध करने वाला है। यह भारत के बाहर बसे भारत की मनोव्यथा को जानने-समझने का एक श्रेष्ठ माध्यम है। डॉ. पद्मेश गुप्त का यह कहानी-संग्रह डेड एंड, जो वास्तव में एंड नहीं बल्कि एक शानदार बिगिनिंग है।- डॉ. सच्चिदानन्द जोशीवरिष्ठ लेखक★★★★★पद्मेश के लेखन में मानवीय संवेदना की समझ मिलती है, जो उन्हें श्रेष्ठ कहानीकार बनाती है।- नरेन्द्र कोहली प्रसिद्ध लेखकप्रेम को लेकर महत्त्वपूर्ण कथा-यात्रा, जिसमें प्रेम के सरोकार : प्रेम क्या है? क्या प्रेम नाम की कोई चीज़ है भी! अधूरा प्रेम, विशुद्ध प्रेम! प्रेम बनाम दैहिक सच का शब्द-संसार ! 'डेड एंड' कहानी के गहन भाव और सुघड़ शिल्प ने पद्मेश गुप्त की सार्थक शुरुआत की है। अन्तिम कहानी 'यात्रा' में अस्तित्व से जुड़े कुछ मूलभूत सवाल हैं। लेखन की एक अन्य विधा में नयी पारी के अवसर पर उन्हें बहुत शुभकामनाएँ !- अनिल जोशीसुपरिचित लेखक★★★★★ब्रिटेन में हिन्दी के दो काल हैं, एक पद्मश गुप्त से पहले, दूसरा पद्मेश गुप्त के बाद ।- तेजेन्द्र शर्मा प्रवासी साहित्यकार★★★★★पद्मेश के लेखन की सबसे बड़ी शक्ति उनकी मौलिकता है।- डॉ. सत्येन्द्र श्रीवास्तव प्रवासी साहित्यकार★★★★★पद्मेश गुप्त एक अन्तरराष्ट्रीय स्तर के रचनाकार हैं। अब एक कहानीकार के रूप में भी उनकी पहचान बनी है। उनके यहाँ सामाजिक-आर्थिक यथार्थ अपने सभी रूपों में पूरे वैविध्य के साथ प्रगटहोता है। पाठक उन्हें ज़रूर पसन्द करेंगे।- सन्तोष चौवेवरिष्ठ कवि-कथाकार

पद्मेश गुप्त -आपका जन्म 5 जनवरी 1965 को लखनऊ के समाजसेवी एवं प्रतिष्ठित परिवार में हुआ ।आपने लामर्टिनियर कॉलेज, क्रिश्चियन कॉलेज एवं लखनऊ विश्वविद्यालय से प्रारम्भिक शिक्षा प्राप्त करने के बाद इंस्टीट्यूट ऑफ़ रूर बैतराँ ड्यूपाँ, प्नांस में केमिकल इंजीनियरिंग का अध्ययन तथा कॉस्मेटिक इंडस्ट्रीज़ पर शोध किया। इसके अलावा आप साहित्यरत्न, एम.बी.ए. एवं इंफ़ॉर्मेशन टेक्नोलॉजी में पीएच.डी. की उपाधि भी प्राप्त कर चुके हैं। आप अंग्रेज़ी, हिन्दी, उर्दू एवं फ्रेंच भाषाओं के जानकार हैं।आपने 1990 में लन्दन में यू.के. हिन्दी समिति की स्थापना की। आप ब्रिटेन में साहित्य एवं अन्य विषयों से सम्बन्धित अन्तरराष्ट्रीय स्तर के कई सम्मेलनों, फ़ेस्टिवल, अध्यापकों के अधिवेशन, हिन्दी ज्ञान प्रतियोगिताओं आदि के संयोजन का दायित्व निभा चुके हैं। आपने 2010 में दिल्ली में हुए प्रवासी फ़िल्म महोत्सव के अन्तरराष्ट्रीय संजोयन का दायित्व भी निभाया। 2003 में सूरिनाम मैं होने वाले सातवें विश्व हिन्दी सम्मेलन में आपकी सक्रिय प्रतिभागिता रही। आपकी रचनाएँ ब्रिटेन एवं भारत के अनेक प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रही हैं। मास्को, पोलैंड, बुदापेस्ट, बुकारेस्ट जैसे अनेक प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों में आप व्याख्यान भी दे चुके हैं।आपने यू.के. में हिन्दी की एकमात्र साहित्यिक पत्रिका 'पुरवाई' का 18 वर्षों तक सम्पादन-प्रकाशन एवं 'प्रवासी टुडे' पत्रिका का 8 वर्षों तक सम्पादन किया। लन्दन में टेलीविज़न चौनल पर, हिन्दी कविता पर, 'वाह, क्या बात है' सीरीज का कई महीनों तक संचालन किया। आपने कोरोना काल में 'वैश्विक हिन्दी परिवार' एवं 'वातायन' की साप्ताहिक वर्चुअल संगोष्ठियों का संयोजन किया एवं उनकी स्थापना भी की।आप सन् 2000 में उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान द्वारा विदेशों में हिन्दी प्रचार के लिए सम्मानित किये गये। 2007 में न्यूयार्क में हुए आठवें विश्व हिन्दी सम्मेलन में 'विश्व हिन्दी सम्मान' और 2017 में भारत के राष्ट्रपति श्री प्रणब मुखर्जी द्वारा भारत सरकार के 'पद्मभूषण मोटूरि सत्यनारायण पुरस्कार' से सम्मानित किये गये ।आपके तीन काव्य-संग्रह-आकृति, सागर का पंछी एवं प्रवासी पुत्र तथा यू.के. के हिन्दी कवियों का संग्रह दूर बाग़ में सोंधी मिट्टी प्रकाशित हो चुके हैं।आप 2004 से ऑक्सफ़ोर्ड में ऑक्सफ़ोर्ड बिज़नेस कॉलेज के निदेशक के रूप में कार्यरत हैं।

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