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Devdas

by Sharatchandra Chattopadhyaya
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Book cover type: Paperback
  • ISBN13: 9789350004975
  • Binding: Paperback
  • Subject: N/A
  • Publisher: Vani Prakashan
  • Publisher Imprint: Vani Prakashan
  • Publication Date:
  • Pages: 128
  • Original Price: INR 100.0
  • Language: Hindi
  • Edition: 2nd Edition
  • Item Weight: 200 grams
  • BISAC Subject(s): General

बांग्ला के शीर्षस्थ लेखक शरत्चन्द्र चट्टोपाध्याय का विश्व-प्रसिद्ध उपन्यास देवदास एक अविस्मरणीय प्रेम कथा है। साथ ही, प्रेम की ट्रेजेडी का इतना सशक्त कोई और उदाहरण साहित्य में उपलब्ध नहीं है। कहते हैं, शरत् बाबू अपनी इस रचना से सन्तुष्ट नहीं थे और इसे प्रकाशित करवाना नहीं चाहते थे। लेकिन 1917 में जब देवदास पहली बार प्रकाशित हुआ, तब इसकी धूम मच गई। बांग्ला के पाठक-पाठिकाओं ने इसे सर-आँखों लिया। तभी से यह उपन्यास लगातार इतना लोकप्रिय बना हुआ है कि बहुत-से लोग शरत्चन्द्र चट्टोपाध्याय को देवदास के लेखक के रूप में ही पहचानते हैं। इस उपन्यास को आधार बना कर बांग्ला, हिन्दी, उर्दू, तेलुगु, तमिल और असमिया में कई फिल्में बन चुकी हैं और दर्शकों ने उन्हें बहुत सराहा है। पाकिस्तान और बांग्लादेश में भी देवदास को फिल्माया जा चुका है।यह देवदास, पार्वती और चन्द्रमुखी, तीनों के असफल प्रेम की करुण कथा है, जिसमें प्रेम की भावना उच्चतम रूप में प्रगट हुई है। देवदास और पार्वती बचपन के मित्रा थे, पर उस समय के सामाजिक बन्धनों के कारण उनका परिणय नहीं हो पाता। पार्वती एक अधेड़ जमींदार से ब्याह दी जाती है, पर जीवन भर देवदास को याद करती रहती है। उसके विरह में देवदास शराब और कोठों की जिन्दगी में डूब कर अपने को बरबाद कर लेता है। भटकाव के उन्हीं दिनों में उसकी मुलाकात वार-वधू चन्द्रमुखी से होती है, जो उसके व्यक्तित्व से प्रभावित हो कर उससे अथाह प्रेम करने लगती है। उसकी पवित्रा स्मृति में वह अपना कुत्सित धन्धा छोड़ कर कोलकाता छोड़ देती है और निकट के एक गाँव में सादगी और सेवा का जीवन जीने लगती है। इधर देवदास की हालत निरन्तर बिगड़ती जाती है। पर उसे पार्वती से मिलना जरूर है, क्योंकि वह इसके लिए वचनबद्ध है। लेकिन जब तक वह पार्वती के गाँव तक पहुँचता है, उसकी जीवन यात्रा समाप्त हो चुकी होती है। देवदास की ट्रेजेडी इतनी मार्मिक है और चित्राण तथा शैली इतनी शक्तिशाली कि पहले पन्ने से ही पाठक इसकी गिरफ्त में आ जाता है और अन्त तक बँधा रहता है।

शरतचन्द्र चट्टोपाध्याय बांग्ला के सुप्रसिद्ध उपन्यासकार थे। उनका जन्म हुगली जिले के देवानंदपुर में हुआ। वे अपने माता-पिता की नौ संतानों में से एक थे। अठारह साल की अवस्था में उन्होंने इंट्रेंस पास किया। इन्हीं दिनों उन्होंने "बासा" (घर) नाम से एक उपन्यास लिख डाला, पर यह रचना प्रकाशित नहीं हुई। रवींद्रनाथ ठाकुर और बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय का उन पर गहरा प्रभाव पड़ा।शरतचन्द्र ललित कला के छात्र थे लेकिन आर्थिक तंगी के चलते वह इस विषय की पढ़ाई नहीं कर सके। रोजगार के तलाश में शरतचन्द्र बर्मा गए और लोक निर्माण विभाग में क्लर्क के रूप में काम किया। कुछ समय बर्मा रहकर कलकत्ता लौटने के बाद उन्होंने गंभीरता के साथ लेखन शुरू कर दिया। बर्मा से लौटने के बाद उन्होंने अपना प्रसिद्ध उपन्यास श्रीकांत लिखना शुरू किया।

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