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Dhara Ke Vipreet

by Govind Mishra
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Book cover type: Paperback
  • ISBN13: 9789394902138
  • Binding: Paperback
  • Subject: N/A
  • Publisher: Rajkamal Prakashan
  • Publisher Imprint: Rajkamal Prakashan
  • Publication Date:
  • Pages: 168
  • Original Price: INR 250.0
  • Language: Hindi
  • Edition: N/A
  • Item Weight: 200 grams
  • BISAC Subject(s): N/A

साहित्य के शीर्षस्थ सम्मानों से विभूषित और कई चर्चित-बहुपठित उपन्यासों-कहानियों के सर्जक गोविन्द मिश्र यहाँ प्रथम पुरुष में अपने पाठकों यानी हम सबसे सम्बोधित हैं। ‘धारा के विपरीत' उनकी आत्मकथा है। एक पारदर्शी और सहज मनुष्य की आत्मकथा जिसने अपनी संवेदना, मानवीय मूल्यों की तरफ़दारी और अपने आसपास फैले सुख-दुख को शब्द-बद्ध करने के लिए लेखक होना चुना।

पेशे से आयकर विभाग में उच्च पदों पर रहने वाले गोविन्द मिश्र का बचपन और किशोरावस्था सुख-सुविधा के अत्यल्प साधनों के बावजूद उदारता, अपनेपन और सामाजिक सौहार्द के जिस वातावरण में बीता, अपनी प्राकृतिक संवेदनशीलता और उचित-अनुचित के सहजबोध ने जो अनुभव उन्हें उस दौरान दिये, वे उनकी रचनात्मकता का स्थायी आधार बने। इस आत्मकथा में वे अपने जीवन से जुड़े लोगों का ज़िक्र करते हुए अपनी उन कृतियों का भी जिक्र करते चलते हैं जिनका विषय वे लोग रहे। और इनमें बचपन ही नहीं उनके वयस्क और पेशेवर जीवन में आये लोग और घटनाएँ भी हैं! प्राथमिक अनुभवों ने ही उन्हें लिखने के लिए प्रेरित किया, किसी विचार, खेमे या आग्रह ने नहीं!

आज़ादी से तकरीबन एक दहाई पहले जन्मे गोविन्द जी ने अपने भीतर एक साधारण भारतीय मनुष्य को हर हाल में बचाए रखा! वह मनुष्य जो अपनी मुठभेड़ों में रोज़ कुछ बड़ा होता है। लोगों की असलियतों से मिले विस्मय को संपदा की तरह सहेजकर रखता है और किसी कड़‌वाहट से ख़ुद को विषैला नहीं होने देता। साधारण की इस मौजूदगी को वे साहित्य सर्जना की पहली शर्त मानते भी हैं जो इस आत्मकथा में भी उपस्थित है। ‘सच बता दो तो वह कितने कलुष धो डालता है। सच में वजन होता है।’ एक जगह वे कहते हैं।

यह एक कल्मषरहित जीवन का निर्भार वृत्तांत है जो अपने उद्‌गम से समुद्र की ओर तीव्र गति से जाती नदी की तरह बहता है और उत्तरोत्तर सान्द्र होता जाता है। इसमें लेखक अपनी रचनाओं के बारे में, अफ़सर अपनी चुनौतियों के बारे में, प्रेमी अपने प्रेम के बारे में, पुरुष उन स्त्रियों के बारे में जिनका स्त्रीत्व उसे बरबस मोह लेता है, पति और पिता अपने परिवार के बारे में, दोस्त अपने दोस्तों के बारे में, साहित्यकार अपने साहित्यिक परिवेश की ख़ूबियों-खामियों के बारे में और मनुष्य अपनी मनुष्यता के बारे में अकुंठ भाव से सबकुछ बताता चलता है। और उस समय के बारे में भी जो अपनी तमाम तकनीकी, बौद्धिक और आर्थिक समृद्धि के बावजूद ठीक उसी जगह पर संकरा और कम पड़ जाता है, जहाँ उसे बड़ा और उदात्त होना चाहिए।

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