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Gatha Kurukshetra Ki

by Manohar Shyam Joshi
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Book cover type: Hardcover
  • ISBN13: 9788181438433
  • Binding: Hardcover
  • Subject: N/A
  • Publisher: Vani Prakashan
  • Publisher Imprint: Vani Prakashan
  • Publication Date:
  • Pages: 72
  • Original Price: INR 45.0
  • Language: Hindi
  • Edition: 2nd Edition
  • Item Weight: 100 grams
  • BISAC Subject(s): General

गाथा कुरुक्षेत्र की - भारतीय जातीय-स्मृति की गौरवमयी ध्वनि का नाम है महाभारत - गीता। इसी सच को आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के शब्दों में सुना जा सकता है। आचार्य द्विवेदी जी ने 'महाभारत' को उज्ज्वल चरित्रों का वन घोषित करते हुए लिखा है- 'महाभारत' को उज्ज्वल चरित्रों का वन कहा जा सकता है। वह कवि-रूपी माली का यत्नपूर्वक सँवारा उद्यान नहीं है जिसके प्रत्येक लता पुष्प वृक्ष अपने सौन्दर्य के लिए बाहरी सहायता की अपेक्षा रखते हैं, बल्कि यह अपने आप की जीवनी शक्ति से परिपूर्ण वनस्पतियों और लताओं का अयत्न परिवर्तित विशाल वन है जो अपनी उपमा आप ही है। मूल कथानक में जितने भी चरित्र हैं वे अपने आप में पूर्ण हैं। भीष्म जैसा तेजस्वी और ज्ञानी, कर्ण जैसा गम्भीर और वदान्य, द्रोण जैसा योद्धा, कुन्ती और द्रौपदी जैसी तेजीदृप्त नारियाँ, गान्धारी जैसी पतिपरायण, श्रीकृष्ण जैसा उपस्थित बुद्धि और गम्भीर तत्वदश, युधिष्ठिर जैसा सत्यपरायण, भीम जैसा मस्तमौला, अर्जुन जैसा वीर, विदुर जैसा नीतिज्ञ चरित्र अन्यत्र दुर्लभ है।' मश्जो ने भी 'गाथा कुरुक्षेत्र की' में महाभारत के इन सभी चरित्रों को उनकी सम्पूर्ण उज्ज्वलता से प्रस्तुत कर दिया है। चरित्रों के इस 'पाठ' या टैक्स्ट में अनेक अर्थों की अन्तर्ध्वनियाँ हैं और उनका अन्तर्ध्वनित सत्य है अन्याय के विरोध मं अर्जुन की तरह गांडीव उठाना, अन्यायी को ध्वस्त करना। —कृष्णदत्त पालीवाल

मनोहर श्याम जोशी - 9 अगस्त, 1933 को अजमेर में जन्मे, लखनऊ विश्वविद्यालय के विज्ञान स्नातक मनोहर श्याम जोशी 'कल के वैज्ञानिक' की उपाधि पाने के बावजूद रोजी-रोटी की ख़ातिर छात्र जीवन से ही लेखक और पत्रकार बन गये। अमृतलाल नागर और अज्ञेय इन दो आचार्यों का आशीर्वाद उन्हें प्राप्त हुआ। स्कूल मास्टरी, क्लर्की और बेरोज़गारी के अनुभव बटोरने के बाद अपने 21 वें वर्ष से वह पूरी तरह मसिजीवी बन गये।प्रेस, रेडियो, टी.वी., वृत्तचित्र, फ़िल्म, विज्ञापन सम्प्रेषण का ऐसा कोई माध्यम नहीं जिसके लिए उन्होंने सफलतापूर्वक लेखन कार्य न किया हो। खेल-कूद से लेकर दर्शनशास्त्र तक ऐसा कोई विषय नहीं जिस पर उन्होंने क़लम न उठायी हो। आलसीपन और आत्मसंशय उन्हें रचनाएँ पूरी कर डालने और छपवाने से हमेशा रोकता चला आया। पहली कहानी तब छपी थी जब वह अठारह वर्ष के थे लेकिन पहली बड़ी साहित्यिक कृति तब प्रकाशित करवायी जब सैंतालीस वर्ष के होने आये।केन्द्रीय सूचना सेवा और टाइम्स ऑफ़ इंडिया समूह से होते हुए सन् 1967 में हिन्दुस्तान टाइम्स प्रकाशन में साप्ताहिक हिन्दुस्तान के सम्पादक बने और वहीं एक अंग्रेज़ी साप्ताहिक का भी सम्पादन किया। टेलीविज़न धारावाहिक 'हम लोग' लिखने के लिए सन् 1984 में सम्पादक की कुर्सी छोड़ दी और तब से आजीवन स्वतन्त्र लेखन किया।उन्होंने ही टेलीविज़न में धारावाहिकों की शुरुआत करायी, जिसके कारण उन्हें भारतीय सोप ओपेरा का जनक कहा गया। हम लोग के अलावा 'बुनियाद', 'हमराही', 'मुंगेरीलाल के हसीन सपने' व 'जमीन-आसमान' जैसे चर्चित धारवाहिकों के साथ उन्होंने 'हे राम', 'पापा कहते है', 'भ्रष्ट्राचार' आदि अनेक फ़िल्मों की भी पटकथाएँ लिखीं।'क्याप' उपन्यास के लिए उन्हें वर्ष 2005 में साहित्य अकादेमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया। 30 मार्च, 2006 को श्री जोशी जी का निधन हो गया।उनकी प्रमुख कृतियाँ हैं- कसप, कुरु-कुरु स्वाहा, ट-टा प्रोफ़ेसर, हमजाद, हरिया हरक्यूलिज की हैरानी, क्याप, मैं कौन हूँ (उपन्यास), बुनियाद (नाटक), नेताजी कहिन, उस देश का यारों क्या कहना (व्यंग्य), लखनऊ मेरा लखनऊ, रघुवीर सहायः रचनाओं के बहाने एक संस्मरण (संस्मरण), पटकथा लेखन : एक परिचय (सिनेमा), मंदिर के घाट की पैड़ियाँ (कहानी), बातों-बातों में (साक्षात्कार) 21वीं सदी (कॉलम-आलेख), पश्चिमी जर्मनी पर उड़ती नज़र, क्या हाल हैं चीन के (यात्रा संस्मरण)।

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