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Hindi Ke Namavar Namvar Singh

by Ed. by Gyanranja , Kamla Prasad
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Book cover type: Paperback
  • ISBN13: 9789369446575
  • Binding: Paperback
  • Subject: N/A
  • Publisher: Vani Prakashan
  • Publisher Imprint: Vani Prakashan
  • Publication Date:
  • Pages: 279
  • Original Price: INR 325.0
  • Language: Hindi
  • Edition: N/A
  • Item Weight: 300 grams
  • BISAC Subject(s): N/A

नामवर सिंह बुनियादी रूप से 'नयी आलोचना' के आलोचक हैं। 'नयी कविता' के भीतर छायावादी संस्कार और प्रगतिशील संस्कारों का जो संघर्ष मौजूद रहा, उनकी नयी आलोचना का मूल प्रस्थान इसी संघर्ष की पहचान से शुरू होता है। 'कविता के नये प्रतिमान' में वे उसे हर जगह दुहराते नज़र आते हैं। वे कहते हैं, 'आज नये-से-नये प्रतिमान के लिए सबसे बड़ी चुनौती छायावादी संस्कार हैं।' उन्होंने अपनी पुस्तक 'कहानी : नयी कहानी' में भी स्वीकृत मान्यताओं के ख़िलाफ़ संघर्ष की आवश्यकता पर ज़ोर दिया है।नामवर सिंह के आलोचनात्मक विवेक के निर्माण में जातीय परम्परा का भी योग है। वे अक्सर इस परम्परा को दूसरी परम्परा कहते हैं। देखना चाहिए कि यह दूसरी परम्परा है क्या चीज़ ? दूसरी परम्परा है-जीवन और जगत् के अर्थ, उसकी जटिलताएँ और काव्य की रचनात्मकता का साक्षात्कार करने की। नामवर सिंह की आलोचना-पद्धति में विश्लेषण का बहुत महत्त्व है। अर्थ के लिए यह ज़रूरी है। वे कई कोणों से वर्गीय दृष्टि के साथ सिद्ध करते हैं कि कैसे कोई प्रतिमान मूल्य-दृष्टि के आलोक में अपना अर्थ प्रतिपादित करता है। देखें तो, नामवर सिंह की काव्य-समीक्षा, बल्कि पूरा समीक्षा-कर्म मार्क्सवादी दृष्टि से साहित्य केन्द्रित है। वे वाक्-परम्परा के शोधार्थी रहे। वे आस्वादनों के प्रतिनिधि बनकर सक्रिय रहे। वैचारिक युद्ध के लिए उन्होंने यही मैदान चुना। उनकी युद्ध-शैली महाभारत की रही-युद्ध और जीवन में एक-दूसरे से संवाद। उन्होंने व्यवस्थित सिद्धान्त-निरूपण नहीं किया। प्रचलित सिद्धान्तों की व्याख्या करते वे अपने विश्वासों को व्यक्त करते रहे। उन्हें सूत्रबद्ध करके उनकी आलोचना के सिद्धान्त का संग्रह सम्भव है।नामवर सिंह की आलोचना का क्षेत्र अपेक्षाकृत अकादमिक और बौद्धिक है। उसमें आस्था और आशंका की द्वन्द्वात्मकता बहुत घनीभूत है। अलग से पहचानी जाने वाली आस्था को उन्होंने नकारा। उन्होंने एक जगह हजारीप्रसाद द्विवेदी के फक्कड़ स्वभाव का उल्लेख करते हुए कहा कि यह स्वभाव निबन्ध के योग्य होता है। गौर से देखें तो यह उत्तराधिकार नामवर जी में भी है। यही कारण कि उनकी आलोचना निबन्धों में है। निबन्धों की रचनात्मक शर्त उनकी आलोचना में है। कहने की आवश्यकता नहीं कि निबन्ध स्वभावी आदमी में ही मिलता है।हिन्दी आलोचना में रामविलास शर्मा के बाद जिन लोगों ने विज़न के साथ औसत चर्चाओं से ऊपर उठकर अपनी निजता क़ायम की, उनमें नामवर सिंह प्रमुख रूप से रहे। वे सामान्य और विशेष, देश और काल के द्वन्द्व को पहचानने वाले आलोचक रहे। स्वतन्त्र भारत में जो भावबोध विकसित होकर आया, उसे उन्होंने मूल्य का दर्जा दिया। अकारण नहीं है कि सन् '56 और उसके बाद के समय को उन्होंने बार-बार रेखांकित किया। उन्होंने काव्य-विवेक के क्षेत्र में विरोधियों से, विशेषकर सोशल डेमोक्रेट्स से, एकता और संघर्ष की नीति का इस्तेमाल किया। उनमें जातीय गद्य लिखने की अपार क्षमता रही। भाषा के भीतर विदग्धता का गुण भरपूर। वे प्रहार ज़िन्दादिली और क्रीड़ाभाव से करते। उदाहरण के लिए- 'दादुर बोल रहे थे, गहे कोकिला मोम', इसी तरह अन्यत्र भी। दुश्मन से प्रभावित हुए बगैर उसे प्रभावित करके लौटने वाली भाषिक कला उनके पास स्पष्ट दिखती है। वे ऐसा वृत्त बनाते, जिसमें मूढ़-मन्दमति तत्काल घिर जाता और समानधर्मा अन्तर्मुखी हो जाता। प्रहारों के समय मुस्काना और प्रहारक होकर मुस्काना यह उनके व्यक्तित्व की अहम खूबी रही।इस तरह देखें तो यह पुस्तक जो तीन खण्डों-'जीवन-रेखा', 'व्याख्यान', 'जीवन-स्मृति'-में विभाजित है, नामवर सिंह के आलोचना-कर्म के साथ-साथ जीवन-कर्म पर भी गहराई से बात करती है। अनेक अनदेखे-अनछुए पहलुओं को वृहद् कैनवस देती है ताकि पाठक, अध्येता नामवर सिंह पर लिखे गये लेखों, संस्मरणों, पत्रों आदि के ज़रिये उन्हें एक सम्पूर्णता में जान-समझ सकें, कर सकें अर्जित वह दृष्टि जो क़लम को ही नहीं, जीवन को भी देती है एक नयी दिशा।

ज्ञानरंजन जन्म : 21 नवम्बर 1936, अकोला (महाराष्ट्र) में। प्रारम्भिक जीवन निरन्तर प्रवास में बीता-महाराष्ट्र, राजस्थान, दिल्ली, मध्य प्रदेश, उड़ीसा और उत्तर प्रदेश में। पिता श्री रामनाथ सुमन प्रख्यात गांधीवादी विचारक, लेखक और पत्रकार तथा छायावाद काल के प्रमुख आलोचकों में थे। उनकी यायावरी का गहरा असर। शिक्षा : एम.ए. इलाहाबाद विश्वविद्यालय से। जीविका : जबलपुर विश्वविद्यालय से सम्बद्ध महाविद्यालय में हिन्दी के प्रोफ़ेसर पद से सेवानिवृत्त। पैंतीस वर्षों तक हिन्दी की साहित्यिक पत्रिका 'पहल' के सम्पादक। 'सोवियत लैंड नेहरू अवार्ड', उ.प्र. हिन्दी संस्थान का 'साहित्य भूषण पुरस्कार', म.प्र. साहित्य परिषद् का 'सुभद्राकुमारी चौहान पुरस्कार', 'शिखर सम्मान' (भोपाल), 'प्रतिभा सम्मान' (कोलकाता) और 'अनिल कुमार सम्मान' से विभूषित। देश के प्रमुख विश्वविद्यालयों में कहानियाँ पाठ्यक्रम में। साहित्य अकादेमी, नेशनल बुक ट्रस्ट और एन.सी.ई.आर.टी. द्वारा पाठ्यक्रम और एंथोलॉजी में संगृहीत। अंग्रेज़ी, पोलिश, रूसी, जर्मन और डच भाषाओं में कहानियों के अनुवाद। अब तक पाँच कहानी-संग्रह प्रकाशित। *** कमला प्रसाद जन्म : 14 फरवरी 1938 को सतना ज़िले के गाँव धौरहरा में। प्रकाशन : साहित्यशास्त्र, छायावादोत्तर काव्य की सामाजिक और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि, छायावाद, प्रकृति और प्रयोग, दरअसल, रचना और आलोचना की द्वन्द्वात्मकता, समकालीन हिन्दी निबन्ध और निबन्धकार, कविता तीरे, साहित्य और विचारधारा, मध्ययुगीन रचना और मूल्य, यशपाल (मोनोग्राफ़), गिरा अनयन, सम्पादक की क़लम, आलोचक और आलोचना आदि। 'पहल' पत्रिका से वर्षों जुड़े रहे और 'वसुधा' का भी सम्पादन किया। सम्मान : 'नन्ददुलारे वाजपेयी पुरस्कार' (मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी), 'सुब्रह्मण्यम भारती पुरस्कार' (केन्द्रीय हिन्दी संस्थान, आगरा), 'रामविलास शर्मा सम्मान', 'शमशेर सम्मान' तथा अनेक संस्थानों के सम्मान। निधन : 25 मार्च 2011

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