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Ishq Lamhe

by Ameeta Parsuram 'Meeta'
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Book cover type: Hardcover
  • ISBN13: 9789389012354
  • Binding: Hardcover
  • Subject: N/A
  • Publisher: Vani Prakashan
  • Publisher Imprint: Vani Prakashan
  • Publication Date:
  • Pages: 128
  • Original Price: INR 349.0
  • Language: Hindi
  • Edition: N/A
  • Item Weight: 300 grams
  • BISAC Subject(s): General

मेरा होना भी बस हुआ यूँ ही' शाइरी में मौजूद होने की एक सूरत, जिये होने को दोबारा जीने और हो चुके को अज़-सर-ए-नौ होने से गुज़ारने से बरू-ए-कार आती है। ज़िन्दगी करने या जीने के अमल को हू-ब-हू शाइरी में लाना मुहाल है, क्योंकि इसमें ऐसा बहुत कुछ होता है, जो शाइरी का ख़ाम माल तो बन सकता है, शाइरी नहीं बन सकता। दूसरी बात ये कि ज़िन्दगी करने के अमल पर हमारा कोई इख़्तियार नहीं होता। जबकि शाइरी में दोबारा की और जी जाने वाली ज़िन्दगी पूरी तरह हमारे इख़्तियार में होती है, क्योंकि ये ज़िन्दगी नहीं उसका अक्स होती है, और हम उसे बाहर से मारूज़ी तौर पर देख सकते हैं। अमीता परशुराम ने अपनी शाइरी में इसी इख़्तियार का बख़ूबी इस्तेमाल किया है। उनके यहाँ होने न होने, पाने-खो, मिलने-बिछड़ने के तजुर्बात जिस शिद्दत के साथ बयान में आते हैं, उसका सबब भी यही मालूम होता है कि उन्होंने अपने आप और ज़िन्दगी को बाहर से देखने वाली आँख हासिल कर ली है, एक और बात जो तवज्जो खींचती है कि उनके बेशतर शेर ग़ज़ल के माहौल में बसे मालूम होते हैं, यानी ग़ज़ल-ख़ानदान के फ़र्द नज़र आते हैं। और ये इसलिए मुमकिन हुआ है कि उर्दू की लफ़्ज़ियात और मुहावरे पर उनकी गिरफ़्त ख़ासी मालूम होती है। बेशतर शेरों को दो खानों में रखा जा सकता है, बाज़ शेर सिर्फ़ जज़्बात का इज़हार होते हैं और कुछ सिर्फ़ सोचे हुए, दोनों ही शाइरी की बे-आबरूई का बायस बनते हैं। अमीता परशुराम ने दूसरा और मुश्किल रास्ता इख़्तियार किया है। उनके शेर जज़्बों और महसूसात को समझने की कोशिश का हासिल होते हैं । इसलिए उनमें फ़िक्र की संजीदगी भी होती है और जज़्बों की आँच भी। ‘हाँ निभाये हैं मोहब्बत के फ़राइज़ मैंने मुस्तहिक़ भी हूँ मगर कोई भी इनआम न दे उसने मेरी ही रफ़ाक़त को बनाया मुल्ज़िम मैं अगर भीड़ में थी वो भी अकेला कब था बज़्म-ए-शेर में ऐसे शेरों की शाइरा का ख़ैर-मक़दम है।’-फ़रहत अहसास

मीता' का सफ़र -डॉ. अमीता परशुराम 'मीता' की पैदाइश दिल्ली में सन् 1955 में हुई। इनके वालदाइन, पार्टिशन के वक़्त, गुजराँवाला, पाकिस्तान से दिल्ली आये थे। क्योंकि इनके घर में बोली जाने वाली ज़बानों में, पंजाबी और उर्दू का ज़ोर रहा, मीता की शायरी में भी इन दोनों रंगों का इम्तिज़ाज देखने को मिलता है।मीता जिन शायरों के कलाम से मुताअस्सिर हुईं, उनमें सबसे पहला नाम है साहिर लुधियानवी का है। उनके अलावा नासिर काज़मी और परवीन शाकिर ने भी मीता के शेरी सफर में एक मख़्सूस रोल अदा किया... और फिर गालिब, मीर, फैज़, मजाज़ और फ़िराक पढ़ना तो हर कदम पर लाज़मी था।दाग देहलवी, दिल्ली घराने के अन्दाज़ का मीता की शायरी पर दो तरह से असर वाजेह तौर पर नज़र आता है बेबाक बयानी और मिसरों में रवानी !मिसाल के तौर पर... ये शेर..."उसने मेरी ही रफाक़त को बनाया मुल्ज़िम मैं अगर भीड़ में थी, वो भी अकेला कब था"मीता बचपन से ही कविता, शेर और आज़ाद नज़्में लिखती रहीं। और नफ्सियाती तालीम हासिल करने के बाद मीता की शायरी ने एक मुन्फरिद अन्दाज़ और मुकाम हासिल किया।माहिर-ए-नफ्सियात होने की वजह से, मीता की शायरी, पढ़ने वालों की ज़िन्दगियों से जुड़कर उनके दिल में एक ख़ास जगह बना लेती है...पद्मश्री शायर, नाज़िम और एक अज़ीम शख़्सियत (स्वर्गीय) जनाब अनवर जलालपुरी का कहना है कि, "अमीता परशुराम की शायरी में नारी के पाकीज़ा जज़्बात और अहसासात की ताज़गी है। उनकी शायरी में जागती हुई आँखों की बेचैनी और सोयी हुई आँखों के सपने हैं। प्यार, मोहब्बत और इश्क के साथ साथ, इन्सानी चेहरों के बदलते हुए रंगों की तस्वीर बनाने के हुनर से अमीता जी अच्छी तरह वाकिफ हैं। उनके अशआर में संगीत है... उनकी ग़ज़लें जब मौसीकी में ढल जायें तो ऐसा असर रखती हैं जो कभी ख़त्म नहीं हो पाता। मेरी नेक तमन्नाएँ उनकी खूबसूरत शायरी के साथ हैं।"

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