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Jaati Ka Jahar

by Rajkishor
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Book cover type: Hardcover
  • ISBN13: 9788170555605
  • Binding: Hardcover
  • Subject: N/A
  • Publisher: Vani Prakashan
  • Publisher Imprint: Vani Prakashan
  • Publication Date:
  • Pages: 142
  • Original Price: INR 100.0
  • Language: Hindi
  • Edition: N/A
  • Item Weight: 300 grams
  • BISAC Subject(s): General

आज के प्रश्न जाति का ज़हर - सामाजिक विषमता दुनिया के सभी समाजों में रही है, लेकिन भारत इस मायने में एक अनोखा देश है कि यहाँ जाति प्रथा को शास्त्रीय, सामाजिक एवं राजनीतिक मान्यता दी गई। बेशक इस क्रूर तथा अमानवीय व्यवस्था के ख़िलाफ समय-समय पर विद्रोह भी हुए, किंतु जाति प्रथा का ज़हर कम नहीं हुआ। दिलचस्प यह है कि यह कोई स्थिर व्यवस्था नहीं रही है और जातियों के सोपान क्रम में नये-नये समूह प्रवेश पाते रहे हैं, फिर भी इससे स्वयं जाति प्रथा को कोई धक्का नहीं पहुँचा है। कहने की ज़रूरत नहीं कि भारत की प्रगति में यह एक बहुत बड़ा रोड़ा है। जिस समाज में आंतरिक गतिशीलता न हो तथा मनुष्य की नियति उसके जन्म के समय ही तय हो जाती हो, वह न तो बाह्य चुनौतियों का मुकाबला कर सकता है और न आंतरिक बाधाओं का। आरक्षण की व्यवस्था ने जाति प्रथा के खूंखार क़िले में गहरी सेंध लगाई है, पर दिक्कत यह है कि वह जातिवाद के प्रसार में सहायक भी हो रहा है। ऐसी स्थिति में जाति को या उसके ज़हर को कैसे खत्म किया जा सकता है ? क्या आधुनिकता के विकास से जाति व्यवस्था अपने आप कमजोर हो जाएगी या इसके लिए कुछ विशेष प्रयास करने होंगे ? आखिर क्या वजह है कि जो हिन्दू एकता की बात कहते नहीं अघाते, वे हिन्दू समाज में आंतरिक सुधार के लिए सबसे कम प्रयत्नशील हैं ? क्या कट्टरपंथ और उदारवाद का द्वन्द्व आज अपने निर्णायक चरण में है या हमें कुछ और इंतजार करना पड़ेगा-जब तक भारत का पूरा आर्थिक विकास नहीं हो जाता ? जाति प्रथा की अमानवीयताओं और उससे संघर्ष को विस्तृत फलक पर देखनेवाली एक महत्वपूर्ण पुस्तक | जाति का जहर - जाति प्रथा को तभी से चुनौती मिलती आई, जब से वह अपने अमानवीय अस्तित्व में आई। फिर भी जाति का जहर है कि आज भी बना हुआ है। बेशक आधुनिकता की शक्तियों ने उसे कुछ कमजोर किया है और आरक्षण व्यवस्था ने उसे गंभीर चुनौती दी है, लेकिन जातिविहीन समाज का सपना अभी भी एक यूटोपिया ही है। उलटे कई ऐसी प्रक्रियाएँ चल रही हैं, जो जाति प्रथा को मजबूत करने वाली हैं। ऐसी स्थिति में जाति से संघर्ष की रणनीति क्या हो सकती है ? जाति प्रथा की जटिलताओं का विश्लेषण ही नहीं, बल्कि उससे संघर्ष की अंतर्दृष्टि भी इस पुस्तक की उल्लेखनीय विशेषता है।जाति प्रथा का विनाश, इतिहास की चुनौती, गाँव से शहर तक, मेरी जाति, मुसलमानों में ऊँच-नीच, जाति क्यों ज़हर बन गयी, जातिविहीन समाज का सपना, आरक्षण तो सवर्णों का होना चाहिए, सामाजिक न्याय-मीडिया और गांधी, संस्कृतीकरण और पाश्चात्यकरण, बार-बार जन्म लेती है जाति, जाति कौन तोड़ेगा ।

राजकिशोर - जन्म: 2 जनवरी 1947 को कलकत्ता में।शिक्षा : कलकत्ता विश्वविद्यालय से एम. ए. (हिन्दी),एल. एल. बी. तथा बी. कॉम. (ऑनर्स)। पत्रकारिता की शुरुआत अगस्त 1977 में आनन्द बाजार पत्रिका समूह, कलकत्ता द्वारा प्रकाशित साप्ताहिक 'रविवार' से। 1986-87 में साप्ताहिक 'परिवर्तन' का सम्पादन किया। 1987 से 1990 तक 'रविवार' के संयुक्त सम्पादक। 1990 1996 तक नवभारत टाइम्स, दिल्ली में वरिष्ठ सहायक संपादक। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में हजारों लेख प्रकाशित हो चुके हैं। मुख्यतः राजनीति, समाज एवं आर्थिक विषयों पर लेखन। संप्रति प्रेस इंस्टीट्यूट ऑफ़ इंडिया की त्रैमासिक पत्रिका 'विदुर' के संयुक्त सम्पादक।प्रकाशन : पत्रकारिता के परिप्रेक्ष्य, आज़ादी एक अधूरा शब्द है, स्त्री-पुरुष : कुछ पुनर्विचार, धर्म, साम्प्रदायिकता और राजनीति, हिन्दी लेखक और उसका समाज, उदारीकरण की राजनीति तथा तुम्हारा सुख (उपन्यास) ।सम्पादन : समकालीन पत्रकारिता मूल्यांकन और मुद्दे । सह-सम्पादन: मुसलमान क्या सोचते हैं। लोकप्रिय पुस्तक शृंखला 'आज के प्रश्न' के सम्पादक, जिसके अंतर्गत अब तक 13 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं।पुरस्कार और सम्मान : पत्रकारिता में उल्लेखनीय योगदान के लिए 1988 में लोहिया पुरस्कार, 1990 में हिंदी अकादमी, दिल्ली द्वारा साहित्यकार सम्मान तथा 1995 में बिहार राष्ट्रभाषा परिषद, बिहार द्वारा राजेन्द्र माथुर पत्रकारिता पुरस्कार। 1996 में मध्य प्रदेश सरकार की राजेन्द्र माथुर पत्रकारिता फेलोशिप।

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