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Jangal Ke Jugnu

by Devesh Thakur
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Book cover type: Paperback
  • ISBN13: 9789387330177
  • Binding: Paperback
  • Subject: N/A
  • Publisher: Vani Prakashan
  • Publisher Imprint: Vani Prakashan
  • Publication Date:
  • Pages: 124
  • Original Price: INR 75.0
  • Language: Hindi
  • Edition: 2nd Revised Edition
  • Item Weight: 200 grams
  • BISAC Subject(s): Literary

जंगल के जुगनू - 'समाज सेवा एक यज्ञ है...ज़िन्दगी के अन्तिम छोर पर आकर तुम्हारे मन में कोई आश्वस्ति होनी चाहिए कि तुमने समाज के लिए कुछ किया है। यदि समाज ने तुम्हें कुछ दिया है तो तुमने भी अपने सामर्थ्य भर समाज को कुछ दिया है। उस क्षण और उसी आश्वस्ति के लिए आज का सदुपयोग करो ..अकेले में रह कर दुःखी होने, पश्चाताप करने या आँसू बहाने की अपेक्षा किसी की मुसीबतों को कम करने में सहभागी होना और उसके आँसू पोंछना कहीं बेहतर है।''जंगल के जुगनू' कथाकार द्वारा समाज में नारी की अस्मिता को रेखांकित और प्रतिष्ठित करने का सुविचारित प्रयास है। नारी-विमर्श के इस युग में तथा घर-परिवार, समाज और संस्थानों में व्याप्त अनेक विसंगतियों और विषमताओं के बीच उसके देख को प्रतिष्ठित करना इस कथा का अभिप्रेत है। नारी सामाजिक और संस्थागत परिवेश में ही उपेक्षा, व्यंग्य और कटुता नहीं भोगती, स्वयं अपने परिवार में भी अनेक अवसरों पर उसे प्रताड़ना का शिकार होना पड़ता है। लेकिन अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ते हुए अपनी रचनात्मक और संवेदनशील दृष्टि से वह अपने आड़े आये हुए सभी प्रकार के व्यवधानों से पार पाने में समर्थ हो सकती है। आवश्यकता केवल इस बात की है कि वह अपने निश्चय, संकल्प, उद्देश्य और जीवन मूल्यों पर स्थिर रहे।इस कथा में लेखक का प्रयास यह रेखांकित करना भी रहा है कि विभिन्न वर्गों से आयी महिलाएँ किस प्रकार सामाजिक सरोकार से जुड़कर एक समान विचार भूमि पर आ खड़ी होती हैं और किस प्रकार से दो सर्वथा भिन्न और विपरीत परिस्थितियों और परिवेश में जीने के बावजूद मानवीय संवेदन और सामाजिक प्रतिबद्धता से सम्पृक्त होकर आत्यन्तिक रूप से आत्मीय बन जाती हैं। ......शब्द और शैली के धनी प्रगतिचेता कथाकार देवेश ठाकुर की लेखनी से एक और प्रासंगिक और सार्थक कृति - जंगल के जुगनू।

देवेश ठाकुर - जन्म: 25 जुलाई, 1933; पैठानी (ज़िला अल्मोड़ा, उत्तरांचल) में।शिक्षा तथा अध्यापन: पीएच.डी., डी.लिट्. (हिन्दी); 1956 से 1959 तक बबई विश्वविद्यालय से सम्बद्ध सिडनहॅम कॉलेज तथा 1960 से रामनारायण रुइया कॉलेज में प्राध्यापक, 1993 में कॉलेज के हिन्दी विभागाध्यक्ष के पद से अवकाश ग्रहण।कृतियाँ: पचास से अधिक रचित सम्पादित, अनूदित कृतियाँ प्रकाशित। 'कथा-क्रम' (दो खण्डों में सम्पादित), भ्रम भंग काँचबर, जनगाथा, गुरुकुल, शिखर पुरुष, शून्य से शिखर तक, अन्ततः (उपन्यास); साहित्य के मूल्य, साहित्य की सामाजिक भूमिका, 'नदी के द्वीप' की रचना-प्रक्रिया, 'मैला आंचल' की रचना प्रक्रिया, नयी कविता के सात अध्याय (समीक्षा) 'प्रसाद के नारो चरित्र, आधुनिक हिन्दी साहित्य की मानवतावादी भूमिका, हिन्दी साहित्य तथा साहित्येतिहास : अन्तरानुशासनों का अनुशीलन (शोध) : आजादी की आधी सदी और आम आदमी (तीन खण्ड-राष्ट्रीय इतिहास और समाज (सह लेखन) विशेष रूप से चर्चित।रचनावली: देवेश ठाकुर रचनावली (चुने हुए 24 ग्रन्थों का संकलन, सात खण्ड) 1992 में प्रकाशित।

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