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Kahani Ka Tana-Bana

by Joginder Paul
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Book cover type: Paperback
  • ISBN13: 9789388434966
  • Binding: Paperback
  • Subject: N/A
  • Publisher: Vani Prakashan
  • Publisher Imprint: Vani Prakashan
  • Publication Date:
  • Pages: 168
  • Original Price: INR 299.0
  • Language: Hindi
  • Edition: N/A
  • Item Weight: 200 grams
  • BISAC Subject(s): Comics & Graphic Novels

रज़ा साहब चाहते थे कि हमें हिन्दी में दूसरी भाषाओं की ऐसी कृतियाँ अनुवाद में लाना चाहिए जिन पर हिन्दी में विशेष सामग्री पहले से नहीं है। इसी क्रम में हम रज़ा पुस्तक माला के अन्तर्गत, शुरू से ही, उर्दू, फ़ारसी, बाङ्ला आदि से पुस्तकें हिन्दी में ला रहे हैं । जोगिन्दर पॉल उर्दू के बड़े कथाकार थे और उन्होंने कहानी विधा पर गम्भीरता से विचार किया था जो हिन्दी के अलावा सभी भारतीय भाषाओं के लिए प्रासंगिक है। हमें ‘कहानी का ताना-बाना' प्रस्तुत करते हुए प्रसन्नता है ।-अशोक वाजपेयी

जोगिन्दर पॉल पाँच सितम्बर 1925 को सियालकोट में पैदा हुए। अभी बाईस वर्ष के ही थे कि तकसीम ने उन्हें अपना वतन छोड़ने पर मजबूर कर दिया और वह सियालकोट से हिन्दुस्तान आ गये और 1948 में शादी कर केन्या चले गये। जैसा कि वो अक्सर कहते थे 'चौदह साल के बनवास' के बाद केन्या से वे हिन्दुस्तान लौट आये। इस ‘बनवास' के दौरान ही इनके दो कहानियों के मजमुए ('धरती का काल' और 'मैं क्यों सोचूँ) और एक नॉवेल ('एक बूँद लहू की) छप गये थे। नौकरी की तलाश करते वे पहले हैदराबाद और फिर औरंगाबाद में जा बसे जहाँ वे चौदह साल इंग्लिश के प्रोफ़ेसर और कॉलेज के प्रिंसिपल रहे। इसके बाद आख़िर तक उनका मुक़ाम दिल्ली रहा ।जोगिन्दर पॉल की सबसे पहली कहानी 'त्याग से पहले ' 1945 में 'साक़ी' (दिल्ली) में छपी। उनकी उर्दू में 22 किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं। बहुत से अफ़साने और नॉवेल के अनुवाद हिन्दी और अंग्रेज़ी के अलावा कई दूसरी हिन्दुस्तानी और ग़ैर-मुल्की ज़बानों में भी हो चुके हैं। उनके नॉवेल 'नादीद' का मॉस्को से रूसी ज़बान में तर्जुमा हुआ है। जोगिन्दर पॉल की अदबी ख़िदमात को मानते हुए उन्हें मोदी ग़ालिब अवार्ड, शिरोमणि साहित्यकार अवार्ड, कुल हिन्द बहादुर शाह ज़फ़र अवार्ड, इक़बाल सम्मान, दोहा-कतर अवार्ड, कुल हिन्द परवेज़ साहिदी अवार्ड, उर्दू अकादेमी जैसे पुरस्कारों से नवाज़ा जा चुका है। नॉवेल, कहानियों और लघु-कथाओं में उनका योगदान अनूठा है। साथ ही कहानी के ताल्लुक़ उनके लिखे तनक़ीदी मज़ामीन भी बहुत अहम हैं। ܀܀܀अबु ज़हीर रब्बानी उर्दू की नयी नस्ल के अहम नक़्क़ादों में हैं। उर्दू ज़बान-ओ-बयान, शेर-ओ-शायरी और ख़ास तौर पर फिक्शन से उनकी गहरी दिलचस्पी है। उनकी पीएच.डी. जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से है। इन दिनों वे दयाल सिंह कॉलेज (दिल्ली विश्वविद्यालय) में उर्दू के असिस्टेंट प्रोफ़ेसर हैं। उनके तकरीबन दो दर्जन शोध-पत्र और आलोचनात्मक लेख प्रकाशित हो चुके हैं। उनकी किताब 'जोगिन्दर पॉल की अफ़सानानिगारी' (2015) को क़द्र की निगाह से देखा गया। इस किताब पर उन्हें उर्दू अकादेमी दिल्ली, बिहार उर्दू अकादेमी और उत्तर प्रदेश उर्दू अकादेमी के इनामों से नवाज़ा जा चुका है। उनकी किताब ‘नवआबादयाती निज़ाम और उर्दू अदब' जल्द ही आने वाली है।܀܀܀पुण्य प्रकाश त्रिपाठी दिल्ली विश्वविद्यालय में इटैलियन भाषा और साहित्य पढ़ा रहे हैं। उनका वर्तमान शोध इटैलियन कहानियों के हिन्दी अनुवाद पर केन्द्रित है । इटली सरकार की एक फ़ेलोशिप पर तीन महीने के लिए पेरुज्जा यूनिवर्सिटी फॉर फॉरेनर्स से इटैलियन भाषा और साहित्य पर एडवांस्ड स्टडी कर चुके हैं। इटैलियन दूतावास और सी.बी.आई. के साथ अनुवादक के तौर पर काम करने का अनुभव प्राप्त है । पुर्तगाली भाषा की भी जानकारी रखते हैं। इन्हें उर्दू ज़बान से विशेष प्यार और अनुवाद में ख़ास रुचि है।

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