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Kale Karname

by SuryaKant Tripathi 'Nirala'
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Book cover type: Hardcover
  • ISBN13: 9788181432513
  • Binding: Hardcover
  • Subject: N/A
  • Publisher: Vani Prakashan
  • Publisher Imprint: Vani Prakashan
  • Publication Date:
  • Pages: 64
  • Original Price: INR 95.0
  • Language: Hindi
  • Edition: 2nd Edition
  • Item Weight: 250 grams
  • BISAC Subject(s): General

काले कारनामे - निराला साहित्य को पढ़ते हुए लगता है कि वे पद्य के युग में गद्य की विराट् संवेदना लेकर पैदा हुए थे। इसलिए आलोचकों ने उनके गद्य-साहित्य को काफ़ी देर से सराहा। छायावाद के उस विराट् युग में उनकी कविताओं की ही चर्चा अधिक रही। निराला का गद्य साहित्य है भी विपुल मात्रा में। उनके कुल लघु-बृहद्। पूर्ण-अपूर्ण नौ प्रकाशित उपन्यास हैं। चार कहानी संग्रह हैं और वह आलोचना पुस्तकें हैं। इसके अलावा भी उनके दर्जनों निबन्ध एवं अन्य रचनाएँ हैं। निराला गद्य को 'जीवन संग्राम की भाषाएँ कहते थे और अपने तई उन्होंने उसे कविता से कम महत्त्व कभी भी नहीं दिया, अगर अधिक नहीं दिया हो तो।निराला के गद्य-साहित्य की एक विशिष्टता जो सहज ही अपनी ओर ध्यान खींचती है वह यह है कि उसमें सामान्य व्यक्ति के जीवन का जश्न है। उसमें उनके जीवन का अभाव है, तो भाव भी है, शोक है तो राग भी है। लेकिन है वह सामान्य व्यक्ति का जीवन ही। अपने समकालीनों से निराला की एक और विशेषता उन्हें उनसे अलगाती है वह यह है कि सामान्य जनों का चित्रण करते हुए तटस्थ मुद्रा नहीं अपनाते। बल्कि उनसे तादात्म्य स्थापित करते दिखाई देते हैं। निराला का यही 'निजपन' उनके चरित्रों को बेजोड़ बना देता है उन्हें अपने समय से आगे का रचनाकार ठहरता दिखाई देता है।निराला के उपन्यासों को पढ़ते हुए यह लगता है कि मानों वे गद्य की समस्त सम्भावनाओं की छानबीन कर रहे हों। उनके उपन्यासों में ज़्यादा चर्चा कुल्ली भाट विल्लेसुर बकरिहा आदि की ही होती है 'काले कारनामे' का कोई ज़िक्र नहीं आता। यह एक ऐसा उपन्यास है जो इसका प्रमाण है कि निराला के गद्य में विविधता कितनी थी और उनका 'रेंज' क्या था। 'काले कारनामे' पढ़ना असल में निराला के एक नये पाठ से गुज़रना भी है। एक अलग पाठ से।

सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' - (जन्म: 21 फ़रवरी 1896, निधन 15 अक्टूबर 1961 )निराला जी का नाम मूलतः छायावाद से जोड़ा जाता है, किन्तु उनके कृतित्त्व और व्यक्तित्त्व ने समूची सदी के साहित्य परिदृश्य को प्रभावित किया। बंगाल के महिषादल में उनका जन्म हुआ और अवध प्रदेश के बैसवाड़ा अंचल में उनके जीवन का अधिकांश समय बीता। उनके कृतित्त्व में इन दोनों साहित्य-संस्कृतियों के गहरे रंग उभरकर सामने आते हैं। एक ओर उन पर तुलसीदास का गहरा रंग है, तो दूसरी ओर रामकृष्ण परमहंस, विवेकानन्द और रवीन्द्रनाथ ठाकुर का। वे वेदान्त-दर्शन से गहरे तक प्रभावित होने के बावजूद राष्ट्रीय चेतना और यथार्थवादी दृष्टि में विश्वास करते हैं। उनके सक्रिय जीवन का महत्त्वपूर्ण हिस्सा पत्रकारिता के क्षेत्र में और लखनऊ, इलाहाबाद में रहते हुए बीता।प्रमुख कृतियाँ : (काव्य) राम की शक्तिपूजा, तुलसीदास, सरोज स्मृति, कुकुरमुत्ता, अनामिका, अणिमा, नये पत्ते, बेला, (उपन्यास) अप्सरा, निरुपमा, प्रभावती, कुल्ली भाट, बिल्लेसुर बकरिहा, (कहानी-संग्रह) चतुरी चमार, सुकुल की बीवी, (निबन्ध-आलोचना) रवीन्द्र कविता कानन, चाबुक, प्रबन्ध पराग आदि।

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