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Karmyog

by Swami Vivekanand
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Book cover type: Paperback
  • ISBN13: 9788170553793
  • Binding: Paperback
  • Subject: N/A
  • Publisher: Vani Prakashan
  • Publisher Imprint: Vani Prakashan
  • Publication Date:
  • Pages: 80
  • Original Price: INR 200.0
  • Language: Hindi
  • Edition: 4th Edition
  • Item Weight: 150 grams
  • BISAC Subject(s): Personal Growth / General

भारतीय दर्शन में कर्म वेदान्त की एक धारा है। कर्म का क्षेत्र व्यापक है। कहा गया है- 'योगः कर्मसु कौशलम्' अर्थात् कर्म की कुशलता ही योग है। सभ्यता और संस्कृति के विकास के साथ जब कर्म के अर्थों और क्षेत्रों का विस्तार हुआ, कर्म की शास्त्रीय व्याख्या अपूर्ण और अपर्याप्त लगने लगी। भारतीय वेदान्त में शंकराचार्य द्वारा प्रतिपादित कर्मयोग की अवधारणा और स्वामी विवेकानन्द द्वारा कर्म की व्याख्या में पर्याप्त अन्तर है। स्वामी विवेकानन्द ने कर्म को देशकाल की आवश्यकताओं के अनुसार व्याख्यायित किया है। कर्म से सम्बन्धित उनकी व्याख्याएँ और मान्यताएँ अधिक व्यावहारिक हैं। वैज्ञानिक विकास और प्रौद्योगिकी के इस युग में कर्म की नित्य नयी सम्भावनाओं को ध्यान में रखते हुए कर्म को उसके पारम्परिक अर्थों से अलग लोकसम्मत अर्थों में ग्रहण किया जाना चाहिए। कर्मयोग के बारे में स्वामी विवेकानन्द के दार्शनिक चिन्तन का यही प्रस्थानबिन्दु है ।कर्मयोग पुस्तक में स्वामी विवेकानन्द द्वारा कर्म पर दिये आठ व्याख्यानों के अनुवाद हैं। भारतीय संस्कृति और दर्शन के प्रख्यात मनीषी डॉ. रामविलास शर्मा द्वारा किये गये ये अनुवाद आज के सामाजिक सन्दर्भों में प्रासंगिक और पठनीय हैं।

डॉ. रामविलास शर्मा10 अक्टूबर 1912 को जिला उन्नाव के ऊँचगाँव सानी में जन्म। लखनऊ विश्वविद्यालय से 1932 में बी.ए. और 1984 में अंग्रेजी साहित्य से एम.ए.। '38 से '43 तक लखनऊ विश्वविद्यालय में अंग्रेजी के अध्यापक । '43 से 71 तक बलवन्त राजपूत कॉलेज, आगरा में अध्यापन। '74 तक के. एम. हिन्दी संस्थान के निदेशक रहने के बाद अवकाश ग्रहण। 1949 से 53 तक अखिल भारतीय प्रगतिशील लेखक संघ के महामन्त्री रहे। 30 मई 2000 को देहावसान ।वाणी प्रकाशन द्वारा प्रकाशित डॉ. रामविलास शर्मा की पुस्तकें :भारतीय साहित्य के इतिहास की समस्याएँ, भाषा, युगबोध और कविता, इतिहास दर्शन, कथा विवेचना और गद्य शिल्प, लोकजागरण और हिन्दी साहित्य, मार्क्सवाद और प्रगतिशील साहित्य, मानव सभ्यता का विकास, रूपतरंग और प्रगतिशील कविता की वैचारिक पृष्ठभूमि, विराम चिह्न, जहाज और तूफान (दो खण्ड), बुद्ध वैराग्य तथा प्रारम्भिक कविताएँ, कवियों के पत्र (मैथिलीशरण गुप्त से शिवमंगल सिंह सुमन तक), चार दिन (उपन्यास), तीन महारथियों के पत्र ( वृंदावनलाल वर्मा, किशोरीदास वाजपेयी व बनारसीदास चतुर्वेदी), सदियों के सोये जाग उठे, बड़े भाई, घर की बात, गीतिमाला, पाप के पुजारी (नाटक), संगीत का इतिहास और भारतीय नवजागरण की समस्याएँ ।

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