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Karna Vastav Mein Kaun Tha? "कर्ण वास्तव में कौन था?" | Religious Hinduism Mahabharat Book in Hindi

by Daji Panashikar
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Book cover type: Paperback
  • ISBN13: 9789392013652
  • Binding: Paperback
  • Subject: N/A
  • Publisher: Prabhat Prakashan Pvt. Ltd.
  • Publisher Imprint: Prabhat Prakashan Pvt. Ltd.
  • Publication Date:
  • Pages: 152
  • Original Price: INR 300.0
  • Language: Hindi
  • Edition: N/A
  • Item Weight: 250 grams
  • BISAC Subject(s): General

कर्ण की सामर्थ्ये का सही मूल्यांकन उसके सामने भीष्म ने किया है। इसमें उनकी नाराजगी या एकांगिता को ढूँढऩा निरर्थक है, न ही अर्जुन के प्रति स्नेह के कारण उन्होंने कर्ण का अपमान किया, क्योंकि कर्ण दो-तीन बार अर्जुन से पराजित हो चुका है। उस पर भी वह द्रोण-भीष्म को अपने सामने कुछ नहीं गिनता है।इस उद्दाम अभिमान ने भीष्म को कठोर बोलने के लिए विवश किया है। इसमें भी अंत: पीड़ा है कि कर्ण अब तो स्वयं को सुधार ले! इसके बाद भी जब-जब कर्ण ने वरिष्ठ सदस्यों का अपमान किया है, उस वक्त भी भीष्म ने अपना संयम नहीं छोड़ा। वस्तुत: भीष्म की आयु, युद्ध-कुशलता और ज्ञान का तो कर्ण थोड़ा विचार करता! उसने सामान्य शिष्टाचार भी नहीं रखा, अभद्रता पर उतर आया है।कर्ण-भीष्म में पहले एक बार जो चिनगारी पड़ी, वह इस समय प्रज्वलित हो उठी। उसमें नुकसान दुर्योधन और उसके मित्र कर्ण का ही हुआ है। जब अति महत्त्वाकांक्षा से राष्ट्र के नेता तमाशा करने लगें तो राष्ट्र की जिम्मेदारी तो वह कतई उठा नहीं सकते, अपने साथ राष्ट्र का सर्वनाश करते हैं। बचते हैं इतिहास के पन्नों में बिखरे उसकी क्षुद्र हरकतों के अवशेष!

दाजी पणशीकरमूल नाम : नरहरि विष्णुशास्त्रीजन्म : 1 मई, 1934, मुंबई में।शिक्षण : वेदाध्ययन और संस्कृत का अध्ययन पिताजी कै. पंडित विष्णुशास्त्री की पाठशाला में हुआ।संप्रति : लेखक, वक्ता, महाभारत के व्याख्याता। रामायण-महाभारत पर आजतक 2027 व्याख्यान हुए हैं।ग्रंथ संपदा : ग्यारह। मराठी संतसाहित्य के संपादितग्रंथ : श्री संत एकनाथ कृत ‘भावार्थ रामायण’ दो खंड, श्री संत एकनाथ कृत ‘आठ ग्रंथ’।आगामी : नवा प्रकाश, यक्ष-धर्म संवाद, पौराणिक अमृतकथा।

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