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Konpal Katha

by Arun Prakash
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Book cover type: Hardcover
  • ISBN13: 9788170552185
  • Binding: Hardcover
  • Subject: N/A
  • Publisher: Vani Prakashan
  • Publisher Imprint: Vani Prakashan
  • Publication Date:
  • Pages: 104
  • Original Price: INR 125.0
  • Language: Hindi
  • Edition: 2nd Edition
  • Item Weight: 200 grams
  • BISAC Subject(s): General

कोंपल कथा - कमरे में ज्ञान सूनी आँखों से एकमात्र खिड़की की तरफ़ देख रही थी। आँखों में आँसू और हृदय फटा जा रहा था। अन्दर एक ज्वार कुलाँचे मार रहा था। दर्द का ज्वार जैसे कोई लगातार हृदय को छेद रहा हो। पिटी, लाचार ज्ञान जैसे विक्षिप्त हो गयी हो। सब कुछ बेतरतीब। यह कैसी शादी है? बाबूजी नहीं, बड़का भैया नहीं, विभा दीदी नहीं! यह शादी सबके रहने पर नहीं हो सकती थी? किसी को कुछ पता नहीं। छोटी भाभी, भैया, बस। वे ही सब जानते हैं। यह सत्यनारायण पूजा पूरा नाटक! जरूर कहीं से लड़का पकड़कर ले आये हैं। भाभी भी नहीं बोली। अचानक हँसी-मजाक करने लगी। कल तक तो बोलती भी नहीं थी। उसको जरूर पता था। क्या करे, किससे कहे...कहने से भी कौन सुनेगा... कुँवारी लड़की की कौन सुनता है....दादी... दादी क्या करेगी? अपाहिज, मोहताज! पागल क्या करेगी?भाग जाये! कहाँ? किसके भरोसे, इस आधी रात में? भैया आँगन में। कौन भागने देगा? लड़की क्या हाट पर बिकता हुआ बैल है? किसी खूँटे से दूसरा बैल लाओ, जोड़ी मिला दो! किस आशा में बँधी बैठी रही तू? बाबूजी, भैया, लड़का ढूँढेंगे। धूमधाम से शादी होगी। रोती-बिलखती ससुराल जायेगी। रो, बिलख। शादी से पहले रो... बाद में भी रोते रहना। सारी उम्र रोने को पड़ी है। औरत के पास क्या है रोने के सिवा? कमज़ोर, अपनी जंजीरों में क़ैद। तू औरत क्यों हुई? अपमान, लांछना, आँसू के लिए? दहेजरूपी कोढ़ को बेनक़ाब करते कथानायिका ज्ञान की व्यथा-कथा के बहाने समाज के अज्ञान को बेनक़ाब करने में सक्षम। -इसी उपन्यास से एक अंश।

अरुण प्रकाश - जन्म : 1948 में बेगूसराय ज़िले के निपनियाँ गाँव में।अध्ययन : विज्ञान, प्रबन्ध विज्ञान, होटल प्रबन्ध, हिन्दी-अंग्रेज़ी साहित्य, समाजशास्त्र एवं पत्रकारिता।होटल, प्रकाशन, रसायन उद्योग में वर्षों काम करने के साथ-साथ ट्रेड यूनियन एवं सांस्कृतिक आन्दोलन में सघन कार्य।व्यंग्य, कविता, कथा, नाटक एवं फ़िल्म के लिए लेखन। अब तक 20 चर्चित-अचर्चित कहानियाँ प्रकाशित। 'रक्त के बारे में' कविता-संकलन प्रकाशित। अंग्रेज़ी, पंजाबी, तेलुगू, बांग्ला, कन्नड़ आदि भाषाओं में अनूदित।वर्ष 1987 के कृष्णप्रताप स्मृति कथा पुरस्कार से सम्मानित।

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