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Lakarbaggha Hans Raha Hai

by Chandrakant Devtale
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Book cover type: Hardcover
  • ISBN13: 9788170557302
  • Binding: Hardcover
  • Subject: N/A
  • Publisher: Vani Prakashan
  • Publisher Imprint: Vani Prakashan
  • Publication Date:
  • Pages: 106
  • Original Price: INR 225.0
  • Language: Hindi
  • Edition: 2nd Edition
  • Item Weight: 250 grams
  • BISAC Subject(s): N/A

कविता की मौलिक शर्त यदि सारे मानवीय सरोकारों को अभिव्यक्ति देना है तो हम कह सकते हैं हिन्दी में चन्द्रकान्त देवताले उन बहुत कम कवियों में से हैं जो बहुत दूर तक उसे पूरा करते हैं। उनकी कविताओं में प्रतिबद्धता का अर्थ एकरसता नहीं बल्कि आदमी होने के कई स्वाद, आयाम, गन्ध, स्पर्श, स्वर और रंगों को अभिव्यक्ति देना रहा है। ऐन्द्रिकता उनके सृजन का पिछले चालीस वर्षों से एक अभिन्न हिस्सा रही है जिससे हिन्दी को कुछ बेहतरीन उद्दाम कविताएँ मिली हैं जिनमें आत्मरति या पतनशीलता नहीं है। औरत उनकी कविताओं में कभी अपने आदिम और सार्वभौमिक रूप में आती है, मसलन औरत में, जो हिन्दी में अब एक कालजयी रचना का दर्जा रखती है, कभी पत्नी के रूप में, जैसे महीनों बाद अपने ही घर में जैसी रचना में, कभी सखी जैसी, कमरे में अँधेरा होते ही या तुम हमेशा अकेली छूट जाती हो सरीखी स्तर बहुल कविताओं में। परिवार, माँ और बेटियाँ भी इसी स्निग्धता का अनिवार्य हिस्सा हैं।किन्तु चन्द्रकान्त देवताले की दुनिया निजता और निजी जनों तक ही सीमित होती तो उनकी कविता उतनी बड़ी न हो पाती जितनी वह है। इस संसार में जो भी श्रेयस्कर है वे उसे बचाना चाहते हैं और क्रूरता, हिंसा, दमन, अन्याय, गैर-बराबरी और ऐसे सारे मानव-द्रोह की अपने ढंग से यथासम्भव शिनाख्त करते हैं उसके विरुद्ध चेतावनी देते हैं और उसका मुकाबला करते हैं। यदि उन्होंने लकड़बग्घे का इस्तेमाल प्रतीक रूप में किया है तो इसलिए कि उस अपनी प्रकृति से लाचार जानवर में उन्होंने प्रबुद्ध मानव की पाशविकता देखी है। गाँवों से लेकर महानगर की सड़कों तक पागल कुत्तों, कबर बिज्जुओं, भेड़ियों और लकड़बग्घों जैसे झुंड कल्पनातीत तरीकों से भारतीय मानवता को चींथ रहेहैं और ऐसे में कवि शाश्वतता, सौन्दर्य, कला, संस्कृति, परम्परा अध्यात्म जैसे शब्दों के पीछे नहीं छिप सकता। इसलिए उसकी कविताओं में बहुत सारे मजलूम बच्चे, विपन्न श्रमजीवी, अभागे माता-पिता, बँधुआ मजदूरों की तरह गुलामी करते कारकुन, शोषित और दलित केन्द्रीय उपस्थिति बनाये रहते हैं क्योंकि जब तक पूरे समाज को प्रेम, परिवार और सुखी होने का हक हासिल नहीं होगा तब तक निजी स्वर्ग मात्र अय्याशी ही रहेंगे।'स्वप्न' सरीखी कुछ कविताओं में मुक्तिबोध की जटिल फंतासियों का स्मरण दिलाते हुए चन्द्रकान्त देवताले स्नेह, करुणा, गुस्सा, व्यंग्य, विद्रूप और 'ब्लेड' जैसी कविता में शान्त रस के बहुआयामीय प्रयोग से एक ऐसा काव्य-संसार रचते हैं जिसमें गाँव मौजूद है और नगर भी, निम्न और निम्नमध्यवर्ग हैं तो खाता-पीता भारतीय परोपजीवी उच्चवर्ग भी, मायूसी है तो एक अविजित आशा भी। वे हिन्दी के सर्वाधिक प्रतिबद्ध कवियों में हैं किन्तु उनकी प्रतिबद्धता किताब या संस्था या संगठन से सीखी गयी नहीं है। अपने और अपने आसपास के जीवन और अनुभवों से अर्जित की गयी है। उसके लिए बहुत कठिन ज़िन्दगी जीनी पड़ी है। कवि ने समाज और उसके आतताइयों को इतनी प्रामाणिकता से देखा है कि उसकी कविताएँ उसके समय का ऐसा दस्तावेज़ बनती चली गयी हैं जो पुराना नहीं पड़ता । चन्द्रकान्त देवताले के पास तजिबों और संवेदनाओं के कई स्तर हैं और उनमें से हर एक के लिए एक उपयुक्त भाषा भी है किन्तु अपने समूचे सृजनात्मक सरमाये का इस्तेमाल वे किसी नुमाइश या प्रतिसाद के लिए नहीं बल्कि हमेशा हिन्दुस्तानी आदमी के हक में करते हैं। उनकी कविताएँ हमें सदा बेहतर सोचने, करने और बनने की प्रेरणा देती हैं और हमारे ज़मीर की पहरुआ हैं।- विष्णु खरे

चन्द्रकान्त देवतालेजीलखेड़ा (जिला बैतूल), मध्य प्रदेश में 7 नवम्बर 1936 को जन्म प्रारम्भिक शिक्षा बड़वाह तथा इन्दौर में होल्कर कॉलेज, इन्दौर से हिन्दी साहित्य में एम. ए. सागर विश्वविद्यालय से मुक्तिबोध पर | 1984 में पीएच.डी. 1961 से 1996 तक उच्च शिक्षा विभाग, मध्य प्रदेश शासन के तहत पन्ना, भोपाल, उज्जैन, पिपरिया, राजगढ़, रतलाम, नागदा तथा इन्दौर के कॉलेजों में अध्यापन शासकीय कला एवं वाणिज्य महाविद्यालय, इन्दौर में हिन्दी विभागाध्यक्ष तथा डीन, कला संकाय, देवी अहिल्याबाई विश्वविद्यालय, इन्दौर के पदों से सेवा निवृत्ति के बाद स्वतन्त्र लेखन तथा पत्रकारिता। दैनिक भास्कर, इन्दौर में छह वर्षों तक नियमित स्तम्भ लेखन।कविता संग्रह : हड्डियों में छिपा ज्वर (1973), दीवारों पर खून से (1975), लकड़बग्घा हँस रहा है। (1980), रोशनी के मैदान की तरफ़ (1982), भूखण्ड तप रहा है (1982), आग हर चीज़ में बताई गयी थी (1987), पत्थर की बेंच (1996), इतनी पत्थर रोशनी (2002), उसके सपने (1997) – विष्णु खरे - तथा चन्द्रकान्त पाटील द्वारा सम्पादित संचयन, बदला बेहद महँगा सौदा (1995), उजाड़ में संग्रहालय (2003) तथा जहाँ थोड़ा-सा सूर्योदय होगा (2008) आलोक श्रीवास्तव द्वारा चयन -कविताओं के अनुवाद प्रायः सभी भारतीय भाषाओं और कई विदेशी भाषाओं में भी महत्वपूर्ण अंग्रेजी, जर्मन, बांग्ला, उर्दू, कन्नड़ तथा मलयालम अनुवाद-संकलनों में कविताएँ। लम्बी कविता 'भूखण्ड तप रहा है' तथा संकलन 'उसके सपने' का मराठी में अनुवाद। प्रमुख हिन्दी कविता संकलनों में कविताएँ। ब्रेख्त की कहानी 'सुकरात का घाव' का नाट्य रूपान्तरण मराठी से अनुवाद, समीक्षा तथा सम्पादन में उल्लेखनीय कार्य ।सम्मान : 'मुक्तिबोध फ़ेलोशिप' तथा 'माखनलाल चतुर्वेदी कविता पुरस्कार' तथा मध्य प्रदेश शासन 'द्वारा 'शिखर सम्मान'। उड़ीसा की 'वर्णमाला साहित्य संस्था' द्वारा 'सृजन भारती' सम्मान। अ.भा. मैथिलीशरण गुप्त सम्मान पहल सम्मान। भवमूर्ति अलंकरण सम्मान।

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