Skip to content

Booksellers & Trade Customers: Sign up for online bulk buying at trade.atlanticbooks.com for wholesale discounts

Booksellers: Create Account on our B2B Portal for wholesale discounts

Lakkarbagghe Shahar Mein

by Vikram Singh
Save 34% Save 34%
Current price ₹82.00
Original price ₹125.00
Original price ₹125.00
Original price ₹125.00
(-34%)
₹82.00
Current price ₹82.00

Ships in 7-10 Days

Free Shipping in India on orders above Rs. 500

Request Bulk Quantity Quote
+91
Book cover type: Hardcover
  • ISBN13: 9788170557807
  • Binding: Hardcover
  • Subject: N/A
  • Publisher: Vani Prakashan
  • Publisher Imprint: Vani Prakashan
  • Publication Date:
  • Pages: 94
  • Original Price: INR 125.0
  • Language: Hindi
  • Edition: 2nd Edition
  • Item Weight: 300 grams
  • BISAC Subject(s): General

लकड़बग्घे : शहर में - 'लकड़बग्घे : शहर में' विक्रम सिंह का दूसरा कविता संग्रह है। इन कविताओं का मूल आशय अपसंस्कृत और आसामाजिक होते जाते मनुष्य के वास्तविक चरित्र को उजागर करना है। कवि के सरोकार बेहद स्पष्ट हैं। जहाँ वह सृष्टि की सुन्दरतम रचना को कुरूप होते देखता है वहाँ वह अपना हार्दिक दुख व्यक्त करता है तथा समाज के विद्रूपित यथार्थ को देखकर वह अन्दर तक तिलमिलाता है और ग़लत का प्रतिकार करता है।यहाँ हम मानवीय सद्इच्छाओं के साथ ही रचनाकार के मानसिक संघर्ष को देख सकते हैं। उसकी मुख्य चिन्ता मनुष्य में पशुत्व के स्वाभाविक अंश की आलोचना नहीं; पशुओं का मनुष्य वेश में खुलेआम विचरण करना है। यह सामाजिक विसंगति ही है कि अपने आचरण में पशुवत् व्यवहार करने वाले मनुष्य होने का दिखावा करते हैं और साथ ही अपने सिद्धान्तों पर चलकर सद्भावपूर्वक जीने की इच्छा रखने वाले निर्दोष मनुष्यों का निर्मम संहार करते हैं। इतना ही नहीं ऐसे भ्रष्ट लोग समाज के प्रतिष्ठित, भद्र, और कथित रूप से उदार व्यक्ति माने जाते हैं।ऐसे में कवि का यह दुख कि परिवर्तन का भी सामाजिक शक्तियाँ संगठित होकर अन्याय-अत्याचार का प्रखर विरोध नहीं करती और'अन्धविश्वासों की अफीम खाकर सोये हुए ढूँढ़ रहे हैं हम/ मानवीय समस्याओं के दैवीय हल नहीं मालूम है हमें लौकिक समस्याओं के हल लौकिक ही होते हैं।' ऐसी यथार्थवादी जीवन-दृष्टि रखने वाला कवि ही दुनिया पर विश्वास रखता है और घोषित करता है- 'जगत् मिथ्या नहीं है/जीवन-सच यही है।' उसका स्पष्ट मत है कि 'परलोक की बजाय अब भूलोक पर आना चाहिए।' यह जीवन का सच्चा स्वीकार है।

डॉ. विक्रम सिंह - जन्म : 01.07.1960 गाँव बन्सरमऊ, जनपद मैनपुरी (उ.प्र.)।शिक्षा : एम.ए., पीएच.डी.।पुरस्कार :1. विजयदेव नारायण साही पुरस्कार- उ.प्र. हिन्दी संस्थान से, वर्ष 1996 के लिए, काव्यकृति प्रिंटिंग-मिस्टेक पर। 2. मुलादेवी काव्य पुरस्कार - भारत-भारती साहित्यिक संस्था, अलीगढ़ द्वारा, वर्ष, 1997 के लिए, काव्य संग्रह प्रिंटिंग-मिस्टेक पर।

Trusted for over 49 years

Family Owned Company

Secure Payment

All Major Credit Cards/Debit Cards/UPI & More Accepted

New & Authentic Products

India's Largest Distributor

Need Support?

Whatsapp Us