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Loktantra

by Brahma Dutt Awasthi
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Book cover type: Hardcover
  • ISBN13: 9789380186504
  • Binding: Hardcover
  • Subject: N/A
  • Publisher: Prabhat Prakashan Pvt. Ltd.
  • Publisher Imprint: Prabhat Prakashan Pvt. Ltd.
  • Publication Date:
  • Pages: 136
  • Original Price: INR 300.0
  • Language: Hindi
  • Edition: N/A
  • Item Weight: 200 grams
  • BISAC Subject(s): Political

‘लोकतंत्र’ लोक के जिस हिमालयी शिखर से निकला था, उसका प्रवाह पश्‍च‌िम की भोगवादी स्वार्थपरक दृष्‍टि में इतना छितराया कि उसका मूल-प्रवाह कौन सा है—पहचानना मुश्किल हो गया है, जो अब नाम लेने को तो लोकतंत्र है, पर वास्तव में यह उस गंदी नाली से भी बदतर है, जो प्रवाहहीन होकर सड़ाँध मार रही है।प्रवाहहीन-लोक लोकतंत्र को गति कैसे प्रदान करे? इसके लिए तो लोक को स्वतःस्फूर्त होकर स्वयं सिद्धमना बन भागीरथ प्रयास करना होगा।‘लोकतंत्र’ शीर्षक यह पुस्तक भूमि, जन और संस्कृति के भोगे हुए यथार्थ और वर्तमान लोकतंत्र के पड़े हुए कुठाराघातों से आंदोलित मन की पीड़ा का वह ज्वालामुखी विस्फोट है, जिससे निकले शब्द रूपी प्रक्षिप्‍त-पदार्थ (Pyroclast) देखने में तो बिना लय, ताल, आकार, क्रम के प्रतीत होते हैं परंतु उनका संगीत शुद्ध प्राकृतिक दैवजनित है, जिसको सुनना-समझना सृष्‍टि की आत्मा को आत्मसात् करने जैसा होता है, जहाँ कुछ भी अव्यवस्थित नहीं, सब प्राकृतिक रूप से लयबद्ध और तालबद्ध।लोकतंत्र के इस संगीत को हम सभी महसूस कर आत्मसात् करें, जिससे लोक के आँगन में सृजन और स्व-विकास की स्वर-लहरियाँ फिर से गूँज उठें और हम विजयी हो ‘पाञ्चजन्य’ का नाद कर सकें।

22 सितंबर, 1935 को ग्राम नगला हूशा, जिला फर्रुखाबाद में जनमे विधि-स्नातक डॉ. ब्रह्मदत्त अवस्थी भारतीय महाविद्यालय फर्रुखाबाद में प्राचार्य रहे। भूगोल तथा हिंदी विषय में स्नातकोत्तर उपाधि प्रयाग व कानपुर विश्‍वविद्यालय से प्राप्‍त कीं। माता स्व. श्रीमती रामश्री अवस्थी व पिता स्व.श्री मुंशीलाल अवस्थी के मूल्यों को आत्मसात् कर इन्होंने ‘स्वातंत्र्योत्तर हिंदी नाटकों में लोकतांत्रिक मूल्य’ शीर्षक पर अपना शोध-ग्रंथ प्रस्तुत किया। 1975 के आपातकाल में मीसा-बंदी रहे। सन् 1946 से ही राष्‍ट्रीय स्वयंसेवक संघ में विभिन्न दायित्वों का निर्वाह करते रहे हैं। पंडित दीनदयाल उपाध्यायजी के मार्गदर्शन में डॉ. राममनोहर लोहियाजी के चुनाव संयोजक रहे। उनके मौलिक विचारों से द्वितीय सरसंघचालक परम पूज्य श्रीगुरुजी ने भी अपनी सहमति जताई। उनकी अगणित कृतियों में उनका चिंतन, उनकी अभिव्यक्‍ति, उनके रंग सूर्य की रश्मियों से उतरे हैं। उनके आचरण और कर्म का हिमालयी शिखर उनके लेखन से कहीं अधिक धवल और विशाल है। ‘राष्‍ट्र-हंता राजनीति’, ‘जाग उठो’ व ‘विश्‍व-शक्‍ति भारत’ उनकी अप्रतिम कृतियाँ हैं।

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