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Love Jihad

by Swati Kale
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Book cover type: Paperback
  • ISBN13: 9789352666706
  • Binding: Paperback
  • Subject: N/A
  • Publisher: Prabhat Prakashan Pvt. Ltd.
  • Publisher Imprint: Prabhat Prakashan Pvt. Ltd.
  • Publication Date:
  • Pages: 136
  • Original Price: INR 150.0
  • Language: Hindi
  • Edition: N/A
  • Item Weight: 200 grams
  • BISAC Subject(s): General

मैं पागलों की तरह उसे देख रही थी। उसके लब्ज़ कानों में गूँज रहे थे और जबान सच में मुँह में चिपक गई थी। शादी को एक दिन भी पूरा नहीं हुआ था और झुबेर से ऐसा कुछ सुनने को मिलेगा, मैं सोच भी नहीं सकती थी। मुझे तो यकीन था कि झुबेर कभी भी मेरा दिल नहीं दुखाएगा। मुझे जैसे उसने झिंझोड़कर रख दिया। उसकी बातें बरदाश्त के बाहर थीं। मैं चुपचाप सिर झुकाकर आँसू बहाती रही। शराफत का नकाब पहने हुए झुबेर का असली चेहरा मेरे सामने आ रहा था। वह मेरे घरवालों को, धर्म को, समाज को गालियाँ दिए जा रहा था, रुक ही नहीं रहा था। ऐसा यों कर रहा था वह? उस वत की उसकी नजर एकदम सूखी व ठंडी थी। होंठों के एक कोने से उसका हँसना, गुस्से से जलनेवाली आँखें मेरे दिल में खंजर की तरह चुभ रही थीं। सुबह पाँच बजे वह चुप हुआ और पेट के बल गहरी नींद में सो गया।शादी के पहले का झुबेर, मेरी आँखों के आँसू देखना भी जिसे पसंद नहीं था, मुझे हमेशा हँसते देखना चाहता था, उम्र भर मुझे फूलों जैसा सँभालकर रखने का दावा करनेवाला या यह वही झुबेर है?—इसी उपन्यास से——1——झूठ, फरेब, धोखा, ढकोसला, झूठी संवेदना—यही है ‘लव जिहाद’।भोली-भाली लड़कियों को नाना युतियों से अपने झूठे प्रेमजाल में फाँसकर उनका भावनात्मक और शारीरिक शोषण ही है ‘लव जिहाद’।एक भुतभोगी की यथा-कथा है यह उपन्यास ‘लव जिहाद’।

शाम के सात बज रहे थे। बारिश के दिन थे। आसमान में काले बादल घिर आने से चारों ओर एक उदासी सी छाई थी। पीली लाइट जल रही थी। मैं आनेवाली टेंशन का सामना करने की तैयारी कर रही थी, इतने में ही अंकल बाहर आए। दिल जोरों से धड़कने लगा। उनके हाथ में रोटी का टुकड़ा था। बच्चे पर से उतारकर फेंका और दरवाजे पर ही थूक दिया। उनको देखकर साफ पता चल रहा था कि उन्होंने बहुत ज्यादा पी रखी है। मैं बच्चे पर इनकी छाँव भी नहीं पड़ने नहीं देना चाह रही थी और वे उस नन्ही सी जान को गोद में लेने आ गए। मैं गुस्से में चिल्लाई—‘‘हाथ मत लगाओ उसको! उसकी गरदन देखो। अरे-अरे!’’उनके हाथ में आधा, मेरे हाथ में आधा, मैंने बच्चे को अपनी ओर ले लिया। वे पैर पटकते अंदर चले गए। मैंने झुबेर से कहा, ‘‘मुझे अब यह सब नहीं चलेगा। तुम्हारी-मेरी हद तक ठीक था। लेकिन मेरे बेटे को तकलीफ नहीं होनी चाहिए। कुछ दिनों का है यह, बच्चे को इस तरह से लेते हैं या? उनके मुँह से आनेवाली शराब की बदबू, अपने बच्चे की नाक में गई होगी। छिह! इनसान है कि हैवान तुम्हारा बाप!’’—इसी उपन्यास से

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