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Lugdi Rasoi Aur Anya Kahaniyan

by Ed. by Namita Khare
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Book cover type: Paperback
  • ISBN13: 9789369447190
  • Binding: Paperback
  • Subject: N/A
  • Publisher: Vani Prakashan
  • Publisher Imprint: Vani Prakashan
  • Publication Date:
  • Pages: 208
  • Original Price: INR 299.0
  • Language: Hindi
  • Edition: N/A
  • Item Weight: 250 grams
  • BISAC Subject(s): Short Stories (single author)

जब साहित्य में जुर्म, धोखे और बदले के मसालों को मिलाकर साहित्यिक पकवान तैयार होते हैं तो 'लुगदी रसोई' जैसी कहानियाँ अस्तित्व में आती हैं। प्रस्तुत कहानियाँ-जैसा कि संकलन के नाम से ज़ाहिर है-अपराध कथा की शैली में शामिल हैं। यह शैली देश-विदेश में लंबे समय से जटिल कथानकों, रोमांचकारी रहस्यों और आपराधिक दिमाग की खोज से पाठिकाओं / पाठकों को आकर्षित करती आई है। इसमें अपराध की जांच और न्याय की खोज निहित है और साथ ही वह मानव व्यवहार, सामाजिक मानदंडों, नैतिक प्रश्नों और न्याय की प्रकृति और अपराध और सजा के आसपास की नैतिक दुविधाओं की जटिलताओं को समझने का मौक़ा देती है। मगर इस शैली को साहित्य में लंबे समय तक दोयम दर्जा ही मिल सका। अपराध कथाओं में यह दर्ज़ा महिलाओं को मिलता रहा है। अधिकतर कथाओं में या तो लेडीज़ लापता हैं, और अगर हैं भी तो एक तरफ़ वे " इंसाफ़ मांगती बहू या “हँसती लाश” हैं, जो असहाय हैं, जिन्हें बचाव की ज़रूरत है। और दूसरी तरफ़ वे “फरेबी औरत" हैं या “विषकन्या", जिनका आकर्षण जहरीला है। हिन्दी अपराध साहित्य में तो औरतों की लेखनी भी कमोबेश अनुपस्थित है जबकि साहित्य की अन्य विधाओं में उनके योगदान को किसी भी तरह नकारा नहीं जा सकता। प्रस्तुत संकलन इस अंतर को कम करने के प्रयास में एक कदम है। इसमें अधिकतर कहानियाँ जर्मन-भाषी महिलाओं द्वारा लिखी गई हैं और सभी महिलाओं के बारे में हैं। लेकिन वे सिर्फ़ पीड़िता नहीं हैं, कई कहानियों में तो वे ही उस रचना का कारण हैं। वे फ़ैसला अपने हाथ में लेती हैं। कई बार वे अपने जीवन को अपने नज़रिये से आकार देने के लिए हत्यारी भी बन जाती हैं। संकलित कहानियाँ जर्मन- भाषी देशों (जर्मनी, ऑस्ट्रिया और स्विट्ज़रलैंड) की सामाजिक पेचीदगियों को अपराध कथा के रोमांचकारी तत्वों के साथ मिलाकर एक खास सांकृतिक परिप्रेक्ष्य में ले जाती हैं। ये पाठिकाओं / पाठकों को नए अनुभवों का अवसर देती हैं और मानव स्वभाव के सार्वभौमिक विषयों को भी उजागर करती हैं। यह संकलन हमें न सिर्फ अंतर-सांस्कृतिक संवाद बल्कि आस्वाद के लिए भी आमंत्रित करता है।

नमिता खरे ने जर्मन भाषा के साहित्य को विभिन्न संकलनों में एकत्रित व अनूदित किया है, जैसे 'एक अजनबी से मुलाक़ात, जर्मन भाषी स्त्री-लेखन, 1945-2014', 'ख़्वाहिश है नामुम्किन की, मार्सेल राइष-रानित्सकी द्वारा चयनित कविताएँ' और 'नवम्बर की धूप, आधुनिक आस्ट्रियाई कविताएँ'। इन्होंने साहित्य के 'नोबेल पुरस्कार' से सम्मानित लेखिका हेर्टा म्युलर के उपन्यासों का हिन्दी में काँच के आँसू व ‘भूख का व्याकरण’ नामक शीर्षकों से अनुवाद भी किया है।

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